कम्बोडिया और अंगकोर : मेरा प्रवास

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http://alatusllc.com/parksmartmpls-parking-ramps-now-offer-parksmartplus-pass/ सोशलिज्म कितना खूनी हो सकता है ? पूंजीवाद कितना खूनी हो सकता है ? किसी देश के इतिहास का एक ऐसा कालखंड जब विभिन्न विचारधाराओं के एक के बाद एक इम्प्लीमेंटेशन ने  ३० लाख  (कुल आबादी का २१%) लोग मार दिए ।   कुछ आंकड़ों पर नज़र डालें।  कम्बोडिया को फ्रेंच उपनिवेशवाद से १९५३ में आजादी मिली। राजसत्ता वापस कम्बोडिया के राजकुमार सिंहनूक के हाथ में गयी।  
भयंकर गरीबी में जी रहे जनता के राजा का सबसे प्रिय कार्य था सिनेमा बनाना ! खुद ही लिखते, खुद ही डायरेक्ट करते , खुद ही अभिनय करते और खुद ही देखते ! राजसत्ता को खतरा हुआ कम्युनिज्म से और हीरो की तरह पूंजीवादी आया बचाने।  सन १९६४ से १९७३ तक ९ साल में २७ लाख टन बम अमेरिका ने कम्बोडिया पर गिराए (द्वितीय विश्व युद्ध में गिराए कुल बम से ज्यादा !). जनता की हालत का अंदाज़ा लगाइये !

फिर आये नेहरूवाद से प्रभावित सोशलिज्म और सामाजिक न्याय के हीरो, मिट्टी पुत्र, चे गुएरा और फिदेल कास्त्रो के पक्षधर पोल पॉट और उनकी पार्टी “खमेर रूज” (लाल कम्बोज)। राजा को अपदस्थ करके महान समाजवादी शाषन की स्थापना हुई। जनता खुश ! फिर आया उनका तुगलकी फरमान ! समाजवाद में मार्क्सवाद घुस गया।  वर्णसंकर जायताम। “खमेर रूज” ने बुर्जुआ वर्ग को नया नाम दिया “नए लोग”। शहर में रहने वाले, पढ़े लिखे गरीब लोग बने “नए लोग”।  गांव में रहने वाले गरीब लोग बने “असली लोग”।

Methocarbamol usa रातों-रात शहर को खाली कर गांव में बसने का आदेश दिया गया।  परिवार तोड़ दिए गए।  बैंक रुपये-पैसे  जला दिए गए।  स्कूल-कालेज, हॉस्पिटल, न्यायलय सब बंद। ये सब पूंजीवाद की पहचान है।  सतयुग की खोज में सबको गांव भेज दिया गया।  सबको साथ खाना खाने का आदेश।  सबको खेती करने का आदेश।  बीमारों को पुराने तरीकों से इलाज करने का आदेश। वर्ग विहीन, जाति विहीन  सामाजिक न्याय से परिपूर्ण यूटोपियन सोसाइटी का निर्माण हुआ।  न तो कोई अमीर था न कोई गरीब, न कोई साक्षर था न कोई निरक्षर।  सारे शहरी बुद्धिजीवी चावल के खेतों में खेती सीखते सीखते काल कवलित हो गए।  अरे हाँ धर्म तो भूल ही गया।  बौद्ध , ईसाई और  इस्लाम सबके साथ एक जैसा व्यवहार हुआ।  सबके पुजारियों को मार दिया गया ! २५००० बौद्ध भिक्षु  निर्वाण को प्राप्त हुए।  समाजवाद में धर्म का क्या काम ! सतयुग है भाई !

३० लाख लोगों के मरने के बाद (इसमें आधे को मारा गया और बाकी असमय मर गए ) , असल सामाजिक न्याय स्थापित होने के बाद भी कम्बोडिया बर्बाद रहा, जनता नाखुश रही । सन १९९६ में आखिरकार खमेर रूज से पूर्णतः मुक्ति मिली।  मैंने स्वभावतः बहुत समझने की कोशिश की अभी कम्बोडिया में किस प्रकार की शाषन व्यवस्था है। राजतन्त्र है, प्रजातंत्र है , क्या है।  मुझे समझ नहीं आया की क्या है। शायद जेएनयू  से राजनीति विज्ञान में डॉक्टरेट करने के बाद समझ पाऊँ ! पर इतना तो तय है की कम्बोडिया के लोगों क विकास हो रहा है की नहीं इतना समझने के लिए शायद मानवशास्त्र में डिग्री की जरुरत नहीं है।  कम्बोडिया में अब अमेरिकी डालर चलता है। पूंजीवाद से लोगों के जीवनस्तर में सुधार आया है जो मुख्यतः शहरों तक सीमित है।  कुछ खास लोग अल्ट्रा रिच भी हो गए हैं।  यही तो पूंजीवाद की खूबी है !

mihir jha vicharbindu

मैं जब सीयाम रीप हवाई अड्डे पर उतरा तो सुबह के सात बजे थे। नींद में ऊंघते इमीग्रेशन आधिकारियों को देखकर थोड़ी टेंशन तो हुई पर कम ही लोग उतरे थे तो ज्यादा असुविधा नहीं हुई।  भारतीयों को वहां “वीसा ऑन अराइवल” मिलता है।  अभी तक बीस के करीब जितने भी देशों में गया हूँ उनमे पहली बार ही हाथ से लिखकर दिया गया वीसा मिला ! तीस डालर में तीस दिन का वीसा। सियाम रीप में सालाना २० लाख लोग आते हैं अंगकोर वट मंदिर देखने। पर्यटकों के रुकने, खाने और घूमने का बहुत ही बढ़िया इंतेज़ाम है। साधारण साफ़-सुथरे ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट वाले लॉज से लेकर अति विलासितापूर्ण बहुल सितारा होटलों तक की बहार है।  बाजार का कुछ हिस्सा काफी आधुनिक है और बाकी हिस्सा छोटे शहरी बाजार की तरह। शहरी यातायात का मुख्य साधन मोटरसाइकिल में ट्रेलर जोड़कर बनाया गया टुकटुक है। दूर दराज के गांव से आये गरीब लोग कर्ज़ा लेकर टुकटुक खरीदते हैं और चलाते हैं। साठ से सत्तर हज़ार तक का खर्चा पड़ता है। मेरे टुकटुक ड्राइवर का नाम सुखी था।  बहुत ही शिष्ट और ईमानदार इंसान। मैंने बहुत सारे ब्लॉग्स और लेख देखे हैं जिनमें विकसित देशों के लोग लिखते हैं की कैसे फलाने टुकटुक ड्राइवर ने पाँच डालर ज्यादा ले लिया और ठग लिया। पता नहीं कौन सा कुबेर का खजाना चला गया पांच डॉलर में!  एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में आदतवश मैं हमेशा दाम तय करके ही बैठना पसंद करता हूँ।  एक टुकटुक पर चार से पाँच लोग आराम से बैठ सकते हैं।  शहर का मौसम बिलकुल पुणे की तरह लगा।  सुबह-शाम ठंढ और दोपहर हलकी गर्मी।  घूमने के लिहाज़ से बढ़िया मौसम।  नाश्ते के बाद हम लोग अंगकोर वट मंदिर की तरफ गए जो सियाम रीप शहर से आठ किलोमीटर दूर घने पेड़ों के बीच “अंगकोर अर्चेओलॉजीकल पार्क” में अवस्थित है।

Cambodia and Angkor

अब बहुत लोगों के पेट में कितना भी दर्द हो पर सच्चाई यही है की अंगकोर वट एक हिन्दू मंदिर है।  इसके दीवालों पर उकेरे चित्रों को मैं बहुत कोशिश करके भी रामायण या महाभारत के नहीं हैं ऐसा सिद्ध नहीं कर पाया। फ्रांस और अमेरिकी विद्वानों के शोध से भी यही प्रमाणित हुआ है। अब भारतीय पुरातात्विक संसथान (A S I) इसपर शोध कर रही है। अब देखने वाली बात है की बदलते सरकारों के साथ मंदिर का इतिहास कैसे बदलता है। अपने यहाँ से मानवविज्ञानियों और इतिहास शोधकों को भी वहां भेजना चाहिए ताकि वो सिद्ध कर पाएं की ये द्रविड़ो ने बनाये या आर्यों ने !  जानकारी के लिए बता दूँ की कम्बोजों को इस बात से मलाल नहीं होता की उनका इतिहास हिन्दू था और वर्तमान बौद्ध है। यहाँ का राज्य धर्म भी बौद्ध ही है।   मेरे एक मित्र बता रहे थे की अंगकोर वट का रिश्ता अंग प्रदेश से है। अब यह तो शोध का विषय है पर कुछ जानकारियां मिली जो निम्नलिखित हैं :

“अंगकोर की स्थापना का श्रेय जयवर्मन् द्वितीय (802-854 ई.) को दिया जाता है। उसने अंगकोर वंश की नींव डाली और कंबोज को जावा की अधीनता से मुक्त किया। उसने संभवत: भारत से हिरण्यदास नामक ब्राह्मण को बुलवाकर अपने राज्य की सुरक्षा के लिए तांत्रिक क्रियाएँ करवाईं। इस विद्वान् ब्राह्मण ने देवराज नामक संप्रदाय की स्थापना की जो शीघ्र ही कंबोज का राजधर्म बन गया। जयवर्मन् ने अपनी राजधानी क्रमश: कुटी, हरिहरालय और अमरेंद्रपुर नामक नगरों में बनाई जिससे स्पष्ट है कि वर्तमान कंबोडिया का प्राय: समस्त क्षेत्र उसके अधीन था और राज्य की शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता हुआ अंतत: अंग्कोर के प्रदेश में स्थापित हो गया था।  “

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“जयवर्मन् द्वितीय को अपने समय में कंबुजराजेंद्र और उसकी महरानी को कंबुजराजलक्ष्मी नाम से अभिहित किया जाता था। इसी समय से कंबोडिया के प्राचीन नाम कंबुज या कंबोज का विदेशी लेखकों ने भी प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया था। जयवर्मन् द्वितीय के पश्चात् भी कंबोज के साम्राज्य की निरंतर उन्नति और वृद्धि होती गई और कुछ ही समय के बाद समस्त इंडोचीन प्रायद्वीप में कंबोज साम्राज्य का विस्तार हो गया। महाराज इंद्रवर्मन् ने अनेक मंदिरों और तड़ागों का निर्माण करवाया। यशोवर्मन् (889-908 ई.) हिंदू शास्त्रों और संस्कृत काव्यों का ज्ञाता था और उसने अनेक विद्वानों को राजश्रय दिया। उसके समय के अनेक सुंदर संस्कृत अभिलेख प्राप्य हैं। इस काल में हिंदू धर्म, साहित्य और काल की अभूतपूर्व प्रगति हुई। यशोवर्मन् ने कंबुपुरी या यशोधरपुर नाम की नई राजधानी बसाई। धर्म और संस्कृति का विशाल केंद्र अंग्कोर थोम भी इसी नगरी की शोभा बढ़ाता था। ‘अंग्कोर संस्कृति’ का स्वर्णकाल इसी समय से ही प्रांरभ होता है। 944 ई. में कंबोज का राजा राजेंद्रवर्मन् था जिसके समय के कई बृहद् अभिलेख सुंदर संस्कृत काव्यशैली में लिखे मिलते हैं। 1001 ई. तक का समय कंबोज के इतिहास में महत्वपूर्ण है क्योंकि इस काल में कंबोज की सीमाएँ चीन के दक्षिणी भाग छूती थीं, लाओस उसके अंतर्गत था और उसका राजनीतिक प्रभाव स्याम और उत्तरी मलाया तक फैला हुआ था।”

अब इतने से तो यह समझ आता है की जयवर्मन जी का तंत्र पर बहुत विश्वास था। तंत्र मन्त्र का केंद्र अंग प्रदेश और कोशी मिथिला के महिषी में था तो सही। बौद्ध धर्म का प्रभाव भी इसको खत्म नहीं कर पाया, उलटे तंत्र बौद्ध धर्म में वज्रयान बनकर घुस गया । अब हिरण्यदास का सम्बन्ध अंग से था या जयवर्मन का यह तय करने का जिम्मा आप पर छोड़ता हूँ!  मेरे लिए तो इतना ही काफी है की कोई भारतीय मंदिर ट्रस्ट बिहार में अंगकोर वट की प्रतिकृति बना रहा है जिसे “टाइम ” पत्रिका ने सराहा है !  अब बात अंगकोर वट मंदिर की।

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राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक इस मन्दिर को वर्ष 1983 से कम्बोडिया के राष्ट्रध्वज में स्थान दिया गया है। यह मन्दिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। इसकी दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण है। कई सनातनी प्रसंगों के साथ असुरों और देवताओं के बीच अमृत मंथन का दृश्य भी दिखाया गया है। विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में से एक होने के साथ ही यह मन्दिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। यह मन्दिर कम्बोडिया के अंगकोर में है जिसका पुराना नाम ‘यशोधरापुर’ था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्राय: शिव मन्दिरों का निर्माण किया था। खमेर शास्त्रीय शैली से प्रभावित स्थापत्य वाले इस मन्दिर का निर्माण कार्य सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53 ई.) के शासनकाल में शुरू हुआ था। उनके भांजे एवं उत्तराधिकारी धरणीन्द्र वर्मन के शासनकाल में यह मन्दिर बन कर तैयार हुआ था। मिश्र एवं मेक्सिको के स्टेप पिरामिडों की तरह यह सीढ़ी पर उठता गया है। इसका मूल शिखर लगभग 64 मीटर ऊंचा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी आठों शिखर 54 मीटर ऊंचे हैं। मंदिर साढ़े तीन किलोमीटर लम्बी पत्थर की दीवार से घिरा हुआ है, उसके बाहर 30 मीटर खुली भूमि और फिर 190 मीटर चौड़ी खाई है। विद्वानों के अनुसार यह चोल वंश के मन्दिरों से मिलता-जुलता है। दक्षिण पश्चिम में स्थित ग्रंथालय के साथ ही इस मन्दिर में तीन वीथियां हैं, जिनमें अन्दर वाली अधिक ऊंचाई पर है। निर्माण के कुछ ही वर्ष पश्चात् चम्पा राज्य ने इस नगर को लूटा। उसके उपरान्त राजा जयवर्मन-7 ने नगर को कुछ किलोमीटर उत्तर में पुनस्स्थापित किया। 14वीं या 15वीं शताब्दी में थेरवाद बौद्ध लोगों ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। मन्दिर के गलियारों में तत्कालीन सम्राट, बलि-वामन, स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश पुराण तथा रामायण से संबद्ध अनेक शिलाचित्र हैं। यहां के शिलाचित्रों में रूपायित राम कथा बहुत संक्षिप्त है। इन शिलाचित्रों की शृंखला रावण वध हेतु देवताओं द्वारा की गई आराधना से आरंभ होती है। उसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य है। अगले शिलाचित्र में राम जी धनुष-बाण लिए स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसके उपरांत सुग्रीव से राम जी की मैत्री का दृश्य है। फिर, बालि और सुग्रीव के द्वंद्व युद्ध का चित्रण हुआ है। शिलाचित्रों में अशोक वाटिका में हनुमान की उपस्थिति, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम जी की अयोध्या वापसी के दृश्य हैं।


आलेख : Mihir Jha

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