Category: Analysis / समीक्षा

इश्क कीजिए, फिर समझिये, ज़िन्दगी क्या चीज है..

अवसाद बीमारी है ! बहुत भयंकर वाली । जिसका इलाज समय से ना होने पर लोग जीते जी जिन्दा लाश की तरह होते हैं । आत्महत्या करने का जी करता है ! आज कल के समय में यह किसे और कब हो जाए कुछ पता नहीं । सामाजिक रूप से मान-मर्दन, शारीरिक रूप से बिमार,

डियर कार्ल मार्क्स !

जब आपके अनुयायी पिछले दस सालोँ में जे.एन.यू मे दलितोँ के उत्थान, गरीबोँ को न्याय इत्यादि पर सेमिनार आयोजित कर रहे थे, तो भारत के निम्न मध्यम वर्गीय परिवार का दो यूवक फ्लिपकार्ट बनाने में जुटे थे.

कोशी, मिथिला और सरकारें- खट्टरकाका की डायरी से !

सन 2008 में जब कोशी कोसी में बाढ़ की वजह से मिथिला का एक बहुत बड़ा हिस्सा तबाह हुआ था उस समय मैंने कोशी पर एक ब्लॉग लिखा था कि कैसे स्वतंत्रता से पूर्व और यहां तक की बाद में दिल्ली और बिहार की सरकार ने मिथिला को कोसी की तबाही से जूझने के लिए

थोड़ी सी दारू मिल जाय तो ऑर्केस्ट्रा को भी लाइव कर देंगे पत्रकार जी !

जमीन बदल गई तो मायने बदल गए। मायने बदले तो चेहरा बदल गया,रहन-सहन और जीवन की शर्तें बदल गईं। वैश्विक अर्थशास्त्र की इस बाढ़ के चलते खासा बदलाव आ गया है समाज में। तो फिर कैसा पत्रकार और कैसा दिवस।

जैसे कैंसर का ईलाज़ सिगरेट की डब्बी तोड़ना नहीं हो सकता

अगर कोई शख़्स कैंसर से जूझ रहा हो तो उसका ईलाज़ सिर्फ सिगरेट की डब्बी तोड़ देने भर से नहीं हो सकता । अगर सिगरेट ही उसकी बीमारी की वजह रही हो फिर भी नहीं बल्कि ईलाज़ का सही तरीक़ा ज़रूरी होता है । 

लिंग विभेद / Gender Sensitization

महिलाओं को सबसे अधिक शोषित महिला ही करती है । खेत बेच के बेटा को IIT की तैयारी के लिए भेज दो ! और बेटी “बी.ए.ड” कर ले तो बहुत है । एक बहु के लिए उसका ससुर सबसे अच्छा इंसान होता है लेकिन सास दुनियाँ की सबसे बेकार औरत आखिर क्यों ? ये हजारों

जब पहली बार मेरा परिचय “पेपर लीक” शब्द से हुआ

मैं अभी कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल टायर- टू की परीक्षा से निकला ही था कि देखा कुछ परीक्षार्थी ग्रुप बनाकर मोबाइल में व्यग्रता से झांकते उसमें घुसे जा रहे थे। उनके चेहरे पर निराशाजनित आक्रमकता थी जो शनैः शनैः उनके क्रियाकलापों पर हावी होता जा रहा था।

बदरंग होता बसंत

बसंत के आगमन की पदचाप खोजते जब मैं प्रकृति की ओर उन्मुख हुआ तो कुछेक सरसों के फूल और गेंदें में मुझे बसंत सकुचाया सा मिला । फैलते कंक्रीट के जंगलों में कायदे से रखे गमलों तक पहुँचने में बसंत सहमा-सहमा ,घबराया सा लगा।

लो आज मैं कहता हूं – आई लव यू !

श्री देवी जवानी के दिनों में मेरी क्रश रही थी। अपना पूरा बचपन और किशोरावस्था मधुबाला के सपने देखते बीता था। उन सपनों पर कब श्री देवी काबिज़ हो गई, कुछ पता ही नहीं चला। उनकी फिल्म ‘हिम्मतवाला’ मैंने ग्यारह बार देखी थी। उनके स्वप्निल सौंदर्य, उनकी बड़ी-बड़ी आंखों और उनकी चंचल मासूमियत का जादू

एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं

इस आलेख में, हिंदी मैथिली के प्रखर युवा कवि विकास वत्सनाभ छात्र आन्दोलन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान और भविष्य के सामंजस्य का साधारण बोध करवाते हुए प्रतीत होते हैं । पढिये एक स्पष्ट चिंतन पर आधारित यह आलेख “एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं”
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