मैं, मेरा गाँव और आम का गाछी

mango tree in village

मेरे गाछी का बम्बई आम बोना गया है गजपक्कू मुझे बहुत पसंद है इसलिए मेरे बार-बार व्यस्तता बताने के बावजूद माँ का आदेश था की कल सुबह आम टूटने से पहले गाँव पहुँचो ! उम्र के लिहाज से युवा अवस्था मे प्रवेश कर चुका हूँ लेकिन दिल से बच्चा रजनीश को क्या और कौन पसन्द है माँ से बेहतर कौन समझेगा भला । Continue reading “मैं, मेरा गाँव और आम का गाछी”

“खा लो, नहीं तो एक बगड़ा का मौस घट जायेगा!”

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गाँव से दूर रहना ही “हेहरु” हो जाना हो जाता है। और तब जब आप छात्र-जीवन का निर्वहन कर रहे होते हैं। कब खाए? नहीं खायें? किसी को कोई परवाह नहीं। बंद कमरे में आपको कोई नहीं पूछता। रूम पार्टनर होगा भी तो उसकी भी परिस्थिति आपके ही बरबार होती है। जबतक चल रहा है तबतक तो ठीक है, नहीं तो किसी दिन अंठा कर सो गये। या फिर दुकान का कोई आइटम खाइए जो भूख मिटाने मात्र के लिये भी काफी नहीं होती है। खाने इत्यादि के चक्कर में मैंने कितनों को शहर छोड़ते देखा है। Continue reading ““खा लो, नहीं तो एक बगड़ा का मौस घट जायेगा!””

का करें सर, पैसा तो है नही ! चक्की बेच दें ?

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भरत आज भरथा से भरत भाई हो गए हैं । आज आप इनके गांव जाओ और किसी को पूछो कि भरत जी का घर कहाँ है तो लोग आपको इनके घर तक पहुँचा देंगे, पर चलते-चलते जरूर पूछ देंगे कि कोनों कंपनी से आये हैं का ? बहुते कंपनी वाला सब उनके पास आते रहता है । Continue reading “का करें सर, पैसा तो है नही ! चक्की बेच दें ?”

त्रिशंकु वाली स्थिति है जहां ना आप मूलवासी हैं ना ही प्रवासी

Migrant

गाँव छोड़ने के बाद चित्त उद्विग्न है। गाँव में बाल सखा किशुन से मुलाकात हुई। पूछा कि आजकल क्या कर रहे हो तो जबाब दिया की इज्जत बचा कर दो वक्त की रोटी कमा रहा हूँ। तुम लोगों ने गाँव छोड़ दिया कभी खोज खबर भी नहीं लेते। किसी न किसी को तो गाँव में रहना चाहिए सो मैं गाँव में ही रहता हूँ। Continue reading “त्रिशंकु वाली स्थिति है जहां ना आप मूलवासी हैं ना ही प्रवासी”

शहर को भी खूबसूरत, गाँव के लोग ही बनाते हैं !

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शहर में कोलाहल बढ़ गयी है और गर्मी भी। ये लोगों को तंग कर रही है । रात से ज्यादे दिन सुनसान हो रहे हैं । लोग स्विचों की हवा चाह रहे हैं । बन्द कमरे भर रहना चाह रहे हैं । Continue reading “शहर को भी खूबसूरत, गाँव के लोग ही बनाते हैं !”