Category: Miscellaneous

मैं हूँ दरभंगा का ऐतिहासिक किला

मैं हूँ दरभंगा का ऐतिहासिक किला लगभग 85 एकड़ जमीन के चारों ओर  फैला हुआ हूँ । मेरी ऊँचाई दिल्ली के लाल किले से भी 9 फीट ऊंची है । पर नसीब अपना-अपना !

“संजीदा” पति चाहिए “खरीदा” हुआ नहीं

पटना विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर शालिनी झा अपनी माँ को पत्र लिखती हैं, जिसमें  मध्यमवर्गीय परिवार की औसत लडकियाँ प्रेषक की भूमिका में प्रतीत हो रहीं हैं । “संजीदा“ पति चाहिए “खरीदा“ हुआ नहीं ।

मेरा चेहरा भी है, ज़ुबान भी है !

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि लकड़ी की बनी कोई मूर्ति ग्यारह हज़ार साल तक सही-सलामत रह सकती है ? लकड़ी की बनी ऐसी ही एक मूर्ति सवा सौ साल पहले साइबेरियाई पीट बोग के शिगीर में मिली थी जिसे आरंभिक जांच के बाद साढ़े नौ हज़ार साल पुराना घोषित किया गया था।

बहस ! एक चाय वाले से तीन रूपया के लिए

ऊपर वाले बर्थ पर लेटा हुआ था । चाय बेचने वाला आया और मैंने एक चाय की आर्डर कर दी । पिछले एक साल से रेलवे में सफ़र करते हुए 10 रूपया का नोट निकाल कर देने की आदत हो गयी थी तो दे दिया । फिर..

तत्काल टिकट से भी जल्दी बिक रहा जियोमी रेडमी 4

Amazon.com और Mi.com के जरिये अपने लॉन्चिंग के दिन सिर्फ चार मिनट में रेडमी 4 के 2,50,000 ( दो लाख पचास हजार ) यूनिट बिके हैं। इसके साइट – वाइड आर्डर में 1500 हीट प्रति सेकेण्ड तथा 5 मिलियन हिट प्रतिमिनट की वृद्धि हुयी है । आईये जाने हिंदी में जियोमी रेडमी 4 के features 

छोटकी भौजी !!

आमतौर पर मेरा दिल्ली से प्रेम का एक वजह आप मेट्रो का होना कह लिजिये । इसने इस घुम्मकर किस्म के इन्सान को एक ठौर दिया । और समझ लीजिये उसे और घुमने के लिए उकसाने का भी काम किया । कोई 10 बजे सुबह का समय रहा होगा ।

आर्केस्ट्रा और ताक झांक !

स्टेज सज ही रहा था । साउंड बॉक्स लाइट और म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट लगाया जा रहा था । स्टेज के आगे युवाओं की भीड़ जमने शुरू हो गए थे । कुछ लोग इधर उधर टहल रहे थे । कुछ आपस में बात कर रहे थे और कुछ युवा इधर उधर बैठ आर्केस्ट्रा के शुरू होने का इंतजार कर रहे थे ।

बादल, बारिश और उसकी उन्मुक्तता ।

अशोक के पेड़ के झुरमुट से उसकी खिड़की झाँकती है । जब भी आसमान में काले बादल छाते, तो वो खिड़की के कोने से आसमान को निहारने आ जाया करती । यूँ लगता है जैसे काले बादल के उन्मुक्तता को….

मानने से क्या होता है, बेटा तो चाहिये

बातचीत की शुरूआत मैंने ही की थी । सप्ताह भर का साथ, हमेशा मुस्कुराता हुआ चेहरा और मेरे चुहलपन ने एक नाता सा जोड़ दिया था । दोपहर में फुर्सत के क्षण में साथ बैठे तो मेरे मन में यूँ ही..

बचपन का भोलापन और पापा का डर

सब कुछ सही था । हम अपने धुन में खोये हुए जयपुर के प्रसिद्ध किले  को देखने जा रहे थे । रास्ते में बाइक पर पीछे बैठ कर जल महल को देखने का आनंद कुछ अलग ही तरीके का होता है, तो मैं उस आनंद के सागर में गोते लगा रहा था । गुलाबी सर्दी पुरे….
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