the power of concentration

क्या है मन की एकाग्रता ?

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एक सफल व्यक्ति और एक असफल व्यक्ति की पहचान उसके मन की एकाग्रता से होती है, सफल व्यक्ति अपना काम बुधिमत्ता और एकाग्रचित हो कर करते हैं । अर्थात पूरी तलीनता से करते हैं । जबकि असफल व्यक्ति काम को बोझ समझ कर करते है, एकाग्रमन होकर नहीं ।

क्या है मन की एकाग्रता ?

यदि हम अपनी संकल्प-शक्ति को किसी एक काम में केन्द्रित कर दे, तो हमारे मन में एकाग्रता पैदा हो जएगी और वह काम जल्दी पूरा हो जएगा । एक बार सूफ़ी कवि कबीर अपने जुलाहे के काम में निमग्न थे, तब उनके सामने से बैण्ड-बाजे के साथ एक बारात निकल रही थी । बारात के गुजर जाने के बाद एक व्यक्ति ने उनसे पूछा – ‘क्या बारात इधर से गुजर गई ?’ इस पर कबीर ने कहा  – ‘मुझे क्या मालूम ? में तो अपने काम में लगा था ।’

कलाईल लिखते हैं कि –  ‘कमजोर-से-कमजोर इन्सान भी अपनी शक्तियो को एक वस्तु पर कन्द्रित करके बहूत कुछ कर सकता है । इसके विपरीत अधिकतम शक्तिशाली उन शक्तियो को बहूत सी दिशाओ में बिखेरकर, अपना ध्यान अपने लक्ष्य से भटकाकर हर एक काम में असफल हो सकता है ।’

एक कार्यक्रम में “एंकर” को ‘एनक्रिंग’ के समय मन की एकाग्रता बहूत ही आवश्यक है । जिस कर्यक्रम को एंकर पेश कर रहा है, उसका पूरा ध्यान उस पर केन्द्रित होना चाहिए । यदि उसका ध्यान भटक गया, तो कर्यक्रम उसके हाथ से निकल जयेगा और वह असफल एंकर माना जयेगा । कई बार हमारे साथ जो घटना घटती है हम उस घटना से अपना ध्यान नहीं हटा पाते । और हमारा मस्तिष्क उस विषय वस्तु को ढ़ोता है जिससे हम एकाग्रचित्त नहीं हो पाते ।

एक बार भगवान् बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक गॉव से दुसरे गॉव जा रहे थे, तभी बुद्ध ने एक नवयूवती को जो कीचड़ में गिरी हुई थी, उसे कीचड़ से उठा कर बाहर बिठा दिया । घटना वही ख़त्म हो गई और बुद्ध अपने रास्तें चल पड़े । एक सप्ताह बाद एक शिष्य भगवान् बुद्ध के पास आया और कहने लगा की प्रभु ! में पिछले एक सप्ताह से इस विषय पर सोच रहा हूँ कि आपने सन्यासी हो कर भी उस नवयुवती को क्यों उठाया ? भगवान् बुद्ध बोले, ‘मेनें उस नवयुवती को कुछ क्षणों के लिए उठाया था, परन्तु तुम तो उस नवयुवती को एक सप्ताह से मन में उठाकर घूम रहे हो ।’

अतः हमें अनावश्यक प्रशन अपने मन में नहीं ढ़ोना चाहिए । इस प्रकार के प्रशन अगर आपको परेशान करते है या आप मन को लगाम नहीं दे पा रहे है तो इसका सरलतम उपाय है , ध्यान ……..

ध्यान एक क्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने मन को चेतना की एक विशेष अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है । ध्यान का उद्देश्य कोई लाभ प्राप्त करना हो सकता है या ध्यान करना अपने-आप में एक लक्ष्य हो सकता है । ‘ध्यान‘ से अनेकों प्रकार की क्रियाओं का बोध होता है । इसमें मन को विशान्ति देने की सरल तकनीक से लेकर आन्तरिक ऊर्जा या जीवन-शक्ति  आदि का निर्माण तथा करुणा, प्रेम, धैर्य, उदारता, क्षमा आदि गुणों का विकास आदि सब समाहित हैं ।

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