इश्क कीजिए, फिर समझिये, ज़िन्दगी क्या चीज है..

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अवसाद बीमारी है ! बहुत भयंकर वाली । जिसका इलाज समय से ना होने पर लोग जीते जी जिन्दा लाश की तरह होते हैं । आत्महत्या करने का जी करता है ! आज कल के समय में यह किसे और कब हो जाए कुछ पता नहीं । सामाजिक रूप से मान-मर्दन, शारीरिक रूप से बिमार, किसी अपने से मिला धोखा, खुद से कुछ ज्यादा उम्मीद, बहुत सारे कारण होते हैं । बड़े से बड़े जांबाज लोग अवसाद में मौत को गले लगा रहे हैं ।

ज्यादा तो नहीं कह सकती, इतना तो जरूर हीं कहना चाहती यह सभी चीजें आपसे बढ़कर नहीं है । अवसाद ग्रसित होकर क्या कुछ भला हो सकता है , रोज-रोज मरने से अच्छा जी लिया जाये । कुछ सपनों पर अपनों से बातें कर ली जाए । सामाजिक बदलाव की बहुत जरूरत है , पूरे विश्व में , नहीं तो लोग मौत के आने का नहीं , बल्की खुद मौत को गले लगाने की सोचेंगे ।

ruchi smriti

आधुनिक्ता को अपनाने की जरूरत अगर नहीं समझी जाती तो ना सही, सभी की भावानाओं का सम्मान तो आवश्यक है । एक पीढ़ी के लिए कुछ गलत है तो दूसरी पीढ़ी के लिए दूसरा कुछ, यह निर्णय कोई नहीं कर सकता की सही क्या और गलत क्या ? इसके लिए किसी को भी इरिटेट कर देना कहाँ तक उचित है ।

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अकेलापन बहुत बड़ा कारण है, लोगों की कमी नहीं है, बस दिल की बात कोई जान ले उसी की कमी है । एक गज़ल है “इश्क कीजिए, फिर समझिये, ज़िन्दगी क्या चीज है….” इश्क हर मर्ज की दवा है । प्यार चीजों से करना आध्यात्म के दृष्टी से उचित नहीं माना जाता, परन्तु समस्या का सामाधान जहां से समस्या शुरू हुई वहीं मिलेगा ।

कहने का तात्पर्य यह है कि, खुशी जहाँ गुम हुई है वहीं मिलेगी । प्रेम कीजिए, बस कीजिए, प्रेम को शब्दों में दुनियाँ के सामने भी ले कर आईये । खुद पर भी प्रेम का रंग महसूस कीजिए । हम सभी को एक प्यारी सी दुनियाँ की आवश्यक्ता है, एक उम्र में सबसे पहले वही बना लें, प्यार करने वालों से भड़ी हुई, फिर जीवन में, जीवन होगा । जीवन में रंग होगा, रंगों में आप होंगे, आपमें संसार होगा, एक अद्भुत सी अनुभूति है यह सब अनुभव करना, हां , बहुत हीं सुन्दर , तो आईये मिलकर इस अवसाद को “अलविदा” कहें और जीवन का स्वागत करें ।


आलेख : रुचि स्मृति

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