खेतों की खैरियत


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खेतों की खैरियत जानने मैं अनायस खेतों की तरफ बढ़ चला । दूर से हरे लहलहाते खेत वास्तविक उपज से अधिक का भ्रम पैदा कर रहे थे । मैं नजदीक पहुँचा ही था कि ३” चैौड़ी दरारों को देखकर उम्मीदें दरकने लगी ।

बरबस नजर उपर की ओर आकाशी गंगा को खोजने लगी । सूर्यदेव आग उगल रहे थे । जल के कृत्रिम श्रोत दिख नहीं रहे थे । हवा के होश उड़े थे । न जाने पिछले दिनों हुई वह कौन सी बदरंग बादलों की तेजाबी वर्षा थी जो फसलों को गला रही थी । धरती के कोख को कौन पोसे ? दम तोड़ती फसलों पर व्याधि स्पष्ट दिख रहे थे ।

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कीट प्रबंधन के मकड़ा जाल में फसा मैं स्वयं को असहज महसूस करते हुए वहीं मेड़ पर बैठ लागतों और संभावित उपज के अर्थशास्त्र में उलझ गया । यह सत्य तीव्रता से उद्भासित होने लगा कि कैसीनो जाना और खेतों पर जाना एक ही बात है । मिट्टी के विषय में सोचने की अंतिम परिणति मिट्टी में मिल जाना है तन से, मन से, धन से, विचारों से भी …….


मुझे एकाएक कभी पढ़ीं बाते याद आ गई

हमारे देश के वित्त मंत्री ने कहा
किसानो को लिए गए कर्ज़ का
नियोजन करना नहीं आता
इसीलिए किसान खुदकुशी करते हैं

किसानों ने पूछा
देश का नियोजन अबतक नही जमा
इसके लिए कितने मंत्रियों ने
खुदकुशी की है ।

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कृषकों के सम्मान में छंद रचना, राजनीति में जयकारे, व्यापारियों का खुले मंच से महिमा मंडन आखिर जुआ जैसी खराब लत के कारण कैसे होती है ? सोचते हुए मैंने पाया इस षडयंत्र में सभी शामिल हैं । ये बदमाशों की वो टोली हैं जो बिना श्रम कृषकों के पसीने की कमाई येन केन प्रकारेण हड़प रहे हैं और अपनी प्रशंसाओं से उसे ऐसा करते रहने को उकसा रहे हैं । लागत से कम मूल्य पर उत्‍पादों को बेचनेे की विवशता की नीति बनाकर लागू करने करवाने की साजिश इनकी ही है । उस पर तूर्रा खाद्य सुरक्षा योजना ………

अलाभकारी कार्यों में लगे इतने अधिक मानव संसाधन को हटाकर उत्पादक लाभकारी कार्यों में लगाया जाए तभी षड्यंत्रकारी भूख को समझ सकेंगे । जो उन्हे अप्रत्यक्ष रूप से उकसा कर अपने भोजन पानी का इन्तजाम करते हैं उनपर भारतीय कानून की धारा लगनी चाहिए ॥


लेखकनिशिकांत ठाकुर 


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