Ripunjay Kumar Thakur

पूर्व मध्यकालीन भारतीय इतिहास लेखन : एक समालोचनात्मक अध्ययन

Essays / आलेख
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पूर्व-मध्यकालिन भारत का इतिहास मानव संस्कृति के एक वृहद्-कालीन संक्रान्ति के पहियों पर स्थित था, जिसका अध्ययन किसी भी समाजशास्त्री को उसके मूल प्रवृति के अनुसार आकर्षित करता है । पूर्व-मध्यकालिन भारतीय इतिहास लेखन पर विभिन्न इतिहासकारों ने पिछले चार दशकों में अपने-अपने ढंग से इतिहास लेखन  कर पूर्व मध्यकालीन भारत की राजनैतिक व्यवस्था, समाजिक संस्थाएं एवं शैली, अर्थव्ययवस्था तथा सांस्कृतिक व्यवहारों अथवा विशेषताओं को समझने का प्रयास किया है । ऐसा नहीं है कि उत्तर गुप्त काल का अध्ययन 1980 ई. से पूर्व  विद्वानों ने नहीं किया था बल्कि 1980 के बाद भारतीय  इतिहास लेखन में अभिलेखों तथा पुरात्विक स्रोतों का क्षेत्रीय स्तरों पर अध्यन और नए-नए साहित्यिक तथा पुरातात्विक स्रोतों के गूढ़ अध्ययन के फलस्वरूप एक नई वांग्मय का आविर्भाव हुआ, जिस इतिहास लेखन परंपरा ने भारतीय इतिहास के विस्तृत भुगोल और विभिन्न सांस्कृतिक-सामाजिक विशेषताओं तथा इनकी प्रक्रियात्मक जटिलताओं को समझते हुए एक नई संरचनातीय प्रक्रियात्मक सामाजिक तथा सांस्कृतिक अध्ययन के उपक्रम को वैद्विक अर्थात भारतीय इतिहास लेखन की जगत में परिचय करवाया । बी.डी.चट्टोपाध्याय द्वारा प्रतिपादित “क्षेत्रीय राज्य संरचना” मॉडल  अपने सहज, व्यापक, प्रक्रियात्मक, संरचनात्मक तथा क्षेत्रीय संस्कृतियों के अध्ययन की मौलिकता के कारण विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया और अनेक इतिहासकारों ने इनके राज्य संरचना के प्रक्रियात्मक मॉडल के आधार पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन विशेष सन्दर्भों में किया । बी.डी. चट्टोपाध्याय, हर्मन कुलके आदि के द्वारा निरंतर इस नव परम्परा ने भारतीय इतिहास लेखन की समाकालीन प्रभुत्वशाली इतिहासलेखन से बिना प्राथमिक स्थान्तरण के एक नई पद्दति और नई दृष्टिकोणों के साथ  क्षेत्रीय इतिहासों और क्षेत्रीय सांस्कृतियों का एक समग्र अध्ययन प्रस्तुत किया है जो पूर्व मध्यकालिन भारतीय इतिहास के संक्रांतीय जटिलताओं को समझने के लिए प्रासंगिक बना हुआ है ।

मैं मंद बुद्धि का एक विद्यार्थी प्रस्तुत निबंध के द्वारा भारतीय इतिहास लेखन में क्षेत्रीय इतिहासों के योगदान का एक नई दृष्टि से प्राचीन एवं पुर्वमध्यकालीन भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में उन तत्वों तथा विषयों का खोज करने का एक लघु उदार प्रयास है जो इस बात को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करती है की इतिहास ही नहीं बल्कि इतिहास लेखन भी एक विकासात्मक-प्रक्रिया के मार्ग से यात्रा करती है । पूर्व मध्यकालिन भारत को समझने के लिए  हो रहे अध्ययन कोई नई बात नहीं है क्योंकि देशी ढंग से भी पुराणों तथा अन्य साहित्यिक ग्रंथों के माध्यम से इस समय को समझने का परंपरा रहा है, यह बात अलग है की  भारत की पारंपरिक इतिवृत लेखन पश्चिमी शैली की तरह नहीं रहा और जिसके फलस्वरूप लम्बे समय तक विद्वानों ने भारत में इतिहास लेखन की अनुपस्थिति का उदहारण देते रहे, लेकिन रोमिला थापर जैसे प्रखर इतिहासकार ने देशी इतिहास लेखन की शैली को इतिहास-पुराण तथा अन्य संस्कृत ग्रंथों के माध्ययम से दिखाने का सफल प्रयास किया है तथापि ये पारंपरिक पांडित्य वर्तमान की आधुनिक ढंग से तुलना में तथ्यपरक तथा वस्तुपरक नहीं दीखता है ।


  1. B.D. Chattopadhyaya, The Making of Early Medieval India, 1994, introduction, pp. 1-37.
  2. Romila Thapar, The Past before us, 2013,Delhi.

इतिहास लेखन की विशिष्ट देशज ढंग तो बारहवीं शताब्दी के कवि- इतिवृत्कार द्वारा रचित प्रख्यात एतिहासिक ग्रन्थ “राजतरंगिनी”  में स्पष्टतः देखा जा सकता है, जिसमे कल्हण स्वयं कहते हैं की उन्होनों व्यवहारिक रूप से उपलब्ध सभी साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोतों का अध्ययन कर २२०० वर्ष के वृहद् काल का एतिहासिक अध्ययन किया ह । यद्यपि  इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है की ग्यारहवीं शताब्दीं में केंद्रीय एशिया से आये विद्वान् अलबिरुनी अपने पुस्तक “किताब उल हिन्द”  में भारतीयों के इतिहास के प्रति जागृति के बारे में लिखते हुए यह बताएं हैं की यहाँ इतिहास की घटनाओं के प्रति लोग बहुत जागरूक नहीं हैं, बहुत हद तक यह बात सत्य जान पड़ता है शायद यही कारण हैं की पुराणों में वर्णित इतिहास भी मिथकीय है यधपि इनका मूल अध्ययन कर उस समय की इतिहास को समझा जा सकता है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है । सिर्फ कल्हण के वेज्ञानिक अध्यन का साक्ष्य प्रस्तुत कर हम इतिहास लेखन या भारतीय इतिहास के मूल प्रश्नों से दूरी नहीं बना सकते हैं ।

अठारवीं शताब्दीं के अंतिम दशकों में राजनितिक रूप से भारत में अंग्रेजी कम्पनी क्रमशः बाद में ब्रिटिश साम्राज्य के शासन के स्थापित होने के बाद अंग्रेजों का मुख्य चिंता भारत के जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया को समझना था जो उनके शासन को सुचारू रूप से चलने के लिए नितांत आवश्यक थी जिसके फलस्वरूप संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन, क्षेत्रीय सर्वेक्षण आदि विभिन्न माध्यमों से भारतीय सामाज को समझा गया तथापि ब्रिटिश विद्वान् अपने साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के शिकार रहे और वे भारतीय इतिहास को अपने हित को समझते हुए तथा पश्चिम देश की संस्कृति सर्वोच्चता पर बगुली ध्यान  देते हुए, विस्तृत  अध्यन कर उसको प्रस्तुत किया । वे भारतीय अभिलेखों, मुद्राओं, शिल्पों, मूर्तियों आदि इतिहासिक अध्ययन के अखिल स्रोत्र पर सर्वश्रेष्ठ पश्चिमी प्रभाव की वकालत की । निसंदेह 19 वीं शताब्दी से भारत में आधुनिक ढंग की इतिहास लेखन ब्रितानी इतिहासकारों द्वारा आरम्भ किया गया, विलियम जोंस का इतिहास लेखन भारतीय इतिहास को धर्म के नाम पर हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश कालों में  विभाजित कर विकृत कर दिया जिसका दंश भारत को विभाजन के फलस्वरूप मिला । राजेंद्र लाल मित्र, आनंद कुमार स्वामी, के .पी. जायसवाल, आर.सी, मजुमदार, हेमचन्द्र रे चौधरी और नीलकंठ शास्त्री  जैसे राष्ट्र्वादी विद्वानों ने उसी उन्नीसवीं व बीसवीं सदियों में भारतीय इतिहास को राष्ट्रवादी ढंग से प्रस्तुत किया और यूरोपीय केंद्रित विचारों का खंडन किया । यद्यपि स्वतंत्रता पश्चात की राष्ट्रवादी लेखन राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर भारत को एक संस्कृतीय सूत्र में जोड़ने के विचार को पोषिण किया जिसके कारण भारत का इतिहास अध्यन अखिल भारतीय स्तर तथा कुछ विषयों तक सीमित रहा, जिसमे सामजिक-आर्थिक प्रक्रियों को व्यापकता से समझने का प्रयास नहीं हुआ और न ही क्षेत्रीय स्तर के एतिहासिक अध्ययन का कोई प्रयास हुआ ।

राष्ट्रवादी इतिहास-लेखन की गौरवशाली गाथाओं के उत्तर में साठ के दशक में एक इतिहासकारों का एक नया गुट दामोदर धर्मानंद कोशाम्बी के नेतृत्व में सामने आया जिनका प्रमुख उदेश्य भारतीय इतिहास को प्रमुखतः भौतिक,सामजिक और आर्थिक आधारों पर समझना था । मार्क्सवादी इतिहासलेखन ने विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया, इस विद्यालय के इतिहासकारों ने एतिहासिक भौतिकवाद के प्रतिपादन के आधार पर भौतिक अर्थात पुरातत्विक स्रोतों को साहित्यिक स्रोतों के साथ सामंजस्य बनाकर एक प्रक्रियात्मक एतिहासिक भौतिक व्यवस्था को समझा ।


 3. Kalhna’s Rajtarangini, ed. with original Sanskrit By M.A. Stein,1900, first chapter.
4. Al- Beruni’s  kitab ul Hind, translated  by Q. Ahmed.
5.  R.S. Sharma, V.N.Jha, ed., Indian Society :Historical Probings(In memory of D.D. Kosambi), second         edition,1977,delhi, p.15.

प्रो. डी.डी, कोशाम्बी  अपने मॉडल “कंबाइंड मेथड” और “लिविंग प्रोटोहिस्ट्री” के माध्यम से भारत का इतिहास लिखा, बाद में प्रोफ. रामशरण शर्मा और उनके सहकर्मी इतिहासकार प्रोफ. डी. एन. झा ने कोसाम्बी के इतिहास लेखन को आगे बढ़ते हुए भारतीय इतिहास की एक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन प्रस्तुत किया । विदित है की 1970 के दशक में पूर्व मध्यकाल के भौतिक-सामाजिक-आर्थिक तथा राजनितिक स्थितियों को समझने के लिए प्रसिद्द इतिहासकार राम शरण शर्मा द्वारा प्रतिपादित जिस “सामंतवादीय मॉडल”  ने विद्वानों का आकर्षण प्राप्त किया था अब उसी मॉडल पर आगले पीढ़ी के कई इतिवृत्कारों ने विभिन्न संरचनात्मक प्रश्न उठायें  जैसे : () क्या सम्पूर्ण भारतीय सामजिक-अर्थव्यवस्था को एक ही दृष्टिकोण से समझना प्रासंगिक होगा, () क्या सामंतवाद के कारण नगरों का पूर्ण पतन हो गई ?, () क्या व्यापर में आयी गिरावट के फलस्वरूप वैश्य वर्ण के लोगों का ग्रामीण-कृषि अर्थव्यवस्था में  आ जाने के कारण उनका स्थिति पुनः शुद्र वर्ण की स्थिति मे आ गई तथा वे दास जीवन व्यतीत किये ?, () तथा क्या अखिल राजनितिक विखंडन एवं ब्राह्मणों को भूदान राजनितिक-सामाजिक प्रक्रिया को अंधकारमय युग मान लें ? तो फिर क्षेत्रीय स्तर पर हुए एक अस्थिर संरचना में समय के साथ नई राज्यों और परम्पराओं के विकास को कैसे समझेंगे, और वे कौनसी कारक थी जिसने क्षेत्रीय परम्पराओं को बढ़ावा दिया ? आदि स्थापित यक्ष प्रश्नों के परिणामस्वरूप वैकल्पिक इतिहासों का प्रचलन प्रस्तुत  हुआ । ऐसा नहीं है कि इस मॉडल को चुनौती नहीं मिला लेकिन इस इतिहास लेखन परंपरा का संरचनात्मक प्रक्रियाई और वैकल्पिक ढंगों पर आधारित होना इसे प्रासंगिक बनाई हुई है ।

सामाजिक-आर्थिक अध्ययनों पर तो मार्क्सवादी गुट के इतिहासकारों का ध्यान तो रहा लेकिन उन्होंने अपने “सामंतवादी मॉडल” में बंध क्षेत्रीय इतिहासों पर विशेष ध्यान नहीं दे पायें जिसके फलस्वरूप अगले पीढ़ी के विद्वानों ने यह  महसूस किया गया की भारतीय इतिहास-संस्कृति का अध्ययन कुछ विषयों तथा दृष्टिकोणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों के परम्परओं और वहां की सामजिक-सांस्कृतिक-राजनितिक प्रक्रियाओं को समझने पर जोर दिए । वैसे भी भारत विभिन्न परम्पराओं, साहित्यों, धार्मिक प्रवृतियों वाला देश है जिसका अध्ययन प्रत्येक उपलब्ध  दृष्टिकोणों से होना चाहिए न की किसी एक विशेष मॉडल के अंतर्गत । विभिन इतिहासकारों ने  क्षेत्रीय राज्य संरचना तथा इससे सम्बंधित क्षेत्रीय परम्पराओं के मॉडल को प्रस्तुत कर पूर्व मध्यकालिन भारत को समझने का सम्यक यत्न  कियें और आगे चल कर क्षेत्रीय स्तर पर हुए भारत के विभिन्न परम्पराओं के अध्ययन फलस्वरूप पूर्व मध्यकालिन भारत में विधमान धर्म, अनुष्ठान, लोक परंपरा आदि को समझा गया । एतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टिकोण के ही समृद्ध तार्किक तथा तथ्यात्मक परंपरा में ही प्रशिक्षित होकर विद्वानों का एक गुट “क्षेत्रीय राज्य संरचना” मॉडल के आधार पर पूर्व मध्यकालिन भारतीय इतिहास को समझा, यह कहना अनुचित ही होगा की एकदम इस मॉडल के इतिहासकार स्थापित मॉडल से बाहर हो गए बल्कि यह उसी शैली की विकशित रूप में एक नए दृष्टिकोणों के साथ शंखनाद इस शैली के स्कूल की जर 1970 के दशक में हुए सुरजीत सिन्हा  के द्वारा अध्ययन में देखा जा सकता है यधपि उस समय के प्रभुत्वशाली इतिहासलेखन ने इस शैली पर अनेक बौद्धिक प्रश्न चिन्ह स्थापित किये । निसंदेह इस शैली के द्वारा सम्क्रन्तिकालीन भारतीय काल को सम्यक ढंग से समझा गया है ।

अपने विषय प्रकृति में यह “क्षेत्रीय राज्य संरचना“ मॉडल स्थापित मॉडल ( शर्मा और झा द्वारा हुए अध्ययन ) से कई प्रकार से भिन्न था जैसे इस मॉडल ने संक्रांति तथा परिवर्तन के विभिन्न स्तरों को समझने का प्रयास किया  जिसकों समझने के लिए अन्य विषयों का भी सहारा लिया गया है जैसे एथ्नोग्राफी । चट्टोपाध्याय और हरमन कुलके का समाकलन प्रतिपादन ( एकीकरण मॉडल ) संरचनाओं की प्रक्रियाओं पर ध्यान देते हुए  उन प्रशनों  के उत्तर को खोजा जो उन्होंने उठाये थे और उन्होंने इस मॉडल के स्वरुप उत्तर भारतीय गंगा क्षेत्र से हटकर भी क्षेत्रों का व्यापक अध्ययन किया जिसका मूल अध्ययन स्वरुप इस बात पर निर्भर था की गुप्त काल के बाद किस प्रकार का जटिल राजनितिक मानचित्र का उद्भव तथा विकास हुआ । चट्टोपाध्याय ने  राजस्थान पर, वहीँ कुलके का अध्ययन उड़ीसा पर है  जिसमे प्रक्रियात्मक विकास के विभिन्न स्तरों पर क्रमबद्ध रूप से  ध्यान दिया गया है । कुलके ने जहाँ  पूर्व मध्यकालिन उड़ीसा में हुए संरचनात्मक परिवर्तनों को धार्मिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझा तो वहीं चट्टोपाध्याय राजस्थान के सन्दर्भ में सामजिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्यों पर विशेष ध्यान दिया ।


6. R.S. Sharma, Indian Feudalism, 1965,Calcutta.
7. Chattopadhyaya, introduction.
8. Kunal Ckakrabarti, Religious Process : the Puranas and the Making of Regional Tradition, 2001, Delhi
9. B.P. Sahu, “Writing  Alternative Histories”, Economic and Political Weekly, April 30, 2016, p.1.

चट्टोपाध्याय ने पूर्व मध्यकलीन भारतीय  इतिहास को क्षेत्रीय राज्य संरचना तथा एकीकरण मॉडल के आधार पर  समझने के लिए विभिन्न मुद्दों तथा प्रक्रियात्मक बिन्दुओं  पर ध्यान आकर्षित किया है, जिसे  निम्नलिखित  संरचना में समझा जा सकता  है  :
() राजनीति का विकेंद्रीकरण और स्थानीय राज्यों एक राजनितिक-सामाजिक प्रक्रिया में उनके अपने नए संरचना के साथ उद्भव एवं विस्तार, उदाहरणस्वरुप इस समय राज्य के लिए कार्य करने वाले अधिकारीयों को “राज-पुरुष” के नाम से जाना गया है । भू-दानीय व्यवस्था, कृषि विस्तार और राजनितिक वैधानिकता  का सम्बन्ध ।

() विभिन्न कबीलों का संस्कृतिकरण, एकीकरण तथा कृषिकरण सहित वर्ण व्यस्था में प्रवेश । प्रोफ. चट्टोपाध्याय राजस्थान के सन्दर्भ में अपने अध्ययन में पाए की कबीलों का क्षत्रियकरण हुआ और वे ही समय के साथ राजपुत जाति के रूप में भारतीय इतिहास में सामने आए । इसी प्रकार का क्षत्रियकरण अन्य क्षेत्रों और उनके कबीलों के सन्दर्भों में भी देखा गया है जैसे गुर्जर-प्रतिहार जो पूर्व मध्यकालिन मध्य भारत में प्रमुख शक्ति के रूप में उभरे ।

(ग) अर्थव्यवस्था नगर से ग्राम की ओर स्थान्तरित हुई जिसके परिणामस्वरूप एक जटिल आर्थिक-सामजिक प्रक्रिया का निर्माण हुआ जो वैश्य अभी तक व्यापर आदि कार्यों में लगे थे उन्हें पुनः कृषि कार्यों की ओर लौटना पड़ा और वें राज्य को कर देने वाले कृषकों का वर्ग बने । इस प्रकार चट्टोपाध्याय ने दिखाया है की किस प्रकार पूर्व मध्यकाल भारत में व्यवस्थाएं उतना भी अंधकारमय नहीं था जितना की नगर पतन, व्यापार का बंद हो जाना, वैश्यों के सामजिक हैसियत को गिर जाने और उनका शुद्र के श्रेणी में आ जाने को लेकर शर्मा ने दिखाया है । चट्टोपाध्याय मत देते हैं की पुराने नगरों जैसे पाटलिपुत्र, मथुरा आदि का तो पतन हुआ लेकिन कुछ नगरों का विकास भी हुआ । इस मॉडल में इस बात पर गंभीर चिंतन किया गया की ग्राम सिर्फ ग्रामीण वस्तियाँ नहीं है बल्कि उनके सामाजिक संरचनाओं पर ध्यान दिया गया और यह समझा गया की मूल प्रकृति में एक बस्ती दुसरे बस्ती से भिन्न है तथापि वे कुछ कारकों के माध्यम से एक दुसरे से जुड़े भी है

जैसे भाषा, धर्म, पूजा पद्दति, मंदिर आदि, चुकीं इन तत्वों को एक सिमित क्षेत्र कि दायरे में बांधकर नहीं रखा जा सकता है इसलिये इन्हें संस्कृत का मूल आधार कहा जाता है । इसीप्रकार कोई बस्ती ब्राह्मण बस्ती हो सकती है जिसकी समृद्धि है तो कोई शुद्र बस्ती जिसका स्थिति दयनीय है । क्षेत्रीय एतिहासिक अध्ययन का ही योगदान है कि हम यह समझ पायें हैं की भारत के विभिन्न सांस्कृतिक-भौगिलिक क्षेत्रों की अपनी-अपनी स्थानीय परम्पराएँ तथा व्यवस्थाएं थी उदहारण के लिए मिथिला, ओडिशा और दक्षिण भारत में क्षेत्रीय राज्य संरचना के परिणामस्वरूप राजनैतिक  वैधानिकता प्राप्ति के लिए  ब्राह्मणों को भूदान दिया गया, लेकिन आवश्यक नहीं है इन सभी क्षेत्रों में न्यायिक अधिकार भी ब्राह्मणों को एकसदृश  दिया गया । गंगा वंशीय उड़ीसा के किसी भी अभिलेख में ऐसा प्रमाण नहीं मिलता है की ब्राह्मणों को भूदान सहित न्यायिक अधिकार भी दिया गया । जबकि दक्षिण भारत में प्रशाशनिक अधिकारों का प्रमाण अभिलेखों से प्राप्त होता है । इसी प्रकार बंगाल और उड़ीसा में अधिकतर भूमि ब्राह्मणों के कब्जे में था जबकि असम में गैर ब्राह्मणों के कब्जे में भी था  और यहाँ के सामजिक- आर्थिक विभेदिकरण दुसरे क्षेत्रों से भिन्न दीखता है जो क्षेत्रीय एतिहासिक अध्ययन की प्रासंगिकता को दर्शाती है ।


10. B.P.Sahu, p.2.
11. Chattopadhyay, The Making of Early Medieval India.
12. R.S. Sharma, “Social Changes in Early Medieval India(circa AD 500-1200), published in Sharma’s Rethinking India’s Past, 2009, Delhi, 247-265.

उत्तर-गुप्त काल में वनक्षेत्र का महत्व पुनर्वास कर रहा था जो जटिल राजनितिक-संस्कृतिक प्रणाली से जुड़ा हुआ था ब्राह्मणों को अधिकतर दान में वन क्षेत्र दिया गया था जो गैर ब्राह्मण क्षेत्र थे, इन क्षेत्रों पर उस क्षेत्रीय राजा का भी कोई औपचारिक नियंत्रण नहीं था । कई इतिहासकारों का शोध इस बात को प्रमाणित करता है की भूदान के पीछे कई रणनीतिय कारण था जैसे दान में प्राप्त भूमि पर कृषि करवाया गया जिसके फलस्वरूप वन क्षेत्र के कबीलाई लोगों का कृषिकरण हुआ और वे वर्ण व्यवस्था तथा राज्य को कर देने वाले कृषक बने, साथ ही साथ ब्राह्मणों को विशेष अधिकार मिला तो राजा को उनसे वैधानिकता, इस सब बातों के बीच सबसे महत्वपूर्ण सामजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया हुई जो थी कबीलाई और ब्राह्मणीय पौराणिक देवी देवताओं का सम्न्व्यीकरण । क्षेत्रीय स्तर पर कबीलाई देविओं तथा आस्थाओं के पद्दितियों का वैश्वीकरण हुआ उनके कथाओं तथा परम्पराओं को पुराणों में स्थान मिला, जिसका उपयुक्त उदाहरण बंगाल में  क्षेत्रीय परंपरा की प्रमुख पहचान मंगलचंडी और इसके पौराणिक सम्बन्ध के सन्दर्भ में हमें देखने को मिलता हैं ।

कल्टों अथार्थ परम्पराओं का एकीकरण क्षेत्रीय स्तर की पारम्परा को मजबूत किया और एक प्रक्रिया के मध्य किसी विशेष स्थान और मंदिरों को तीर्थ के रूप में विकसित किया गया जैसे गया, कशी, जगन्नाथ इत्यादि और इन तीर्थ स्थानों का साहित्यिक डॉक्यूमेंटेशन पुराण एवं उपपुराण के माध्यम से हुआ जिसने राज्य की भौगोलिक क्षेत्र को बढ़ाने में और वैधानिकता में महत्वपूर्ण योगदान दिया । वैधानिकता के सन्दर्भ में उड़ीसा का अध्ययन करते हुए कुलके वैधानिकता के सन्दर्भ में दो प्रकार के सूत्रों /कारकों की बात करते हैं () लिखते हैं की जगन्नाथ मंदिर दोनों सूत्रों को दर्शाती हैं इसके माध्यम से ही राज्य को लोगों तक पहुंचना था । यदपि जरुरी नहीं है की दोनों वैधानिकता के सूत्र दुसरे अध्ययन पर भी प्रयोग हो । जगन्नाथ मंदिर का निर्माण और इसकी महिमा मंडन राज्यसत्ता के अभ्यास तथा इसके मुख्य अंग के रूप में भी देखा गया है । बंगाल की परंपरा उड़ीसा की परंपरा से न तो पूर्णतः एक जैसा था और न ही पुर्णतः भिन्न बल्कि उनपर सम-क्षेत्रीय प्रभाव स्पष्टतः देखनो को मिलता है जैसे कबीलाई शक्ति देवी जो तंत्रवाद से भी जुड़ा था का युनिवार्सिलाईजेसन उड़ीसा और बंगाल दोनों में हुआ  लेकिन उनके काल और किंचित प्रकृति में भी भिन्न था जैसे उड़ीसा में जगन्नाथ मंदिर को प्रमुख धार्मिक-राजनितिक स्थल के रूप में विकसित किया गाय, इसके समन्वयी संस्कृति को मंदिर के आसपास रखा गया और मंदिरों का भव्य निर्माण हुआ जबकि यह तथ्य बंगाल के सन्दर्भ में नहीं देखने को मिलता है । बंगाल में मंदिरों का निर्माण नहीं दीखता है यद्यपि असाम में शक्ति कामख्या मंदिर का निर्वाण पूर्व मध्यकालिन समय में हुआ, इस प्रकार हमें विभिन्न क्षेत्रों, समकालीन संस्कृतियों में भी भिन्नता देखने को मिलता है । इन सभी संरच्नात्मक-प्रक्रियाओं के मध्य पूर्व मध्यकालिन भारत के कुछ क्षेत्रों में  बौद्ध और जैन धर्मावलम्बियों को भी दान दिया गाय जिसका उल्लेख हमें अभिलेखों से प्राप्त होता है । इस प्रकार हम देखते हैं की क्षेत्रीय स्तर पर पोषित सामजिक-सांस्कृतिक-राजनितिक व्यवस्थाओं को समझना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही यह एक जटिल कार्य है ।


13. Upinder Singh, The Idea of Ancient India, 2016, Delhi, pp.111.
14. Kesawan Veluthat, The Early Medieval in South India, 2009, Delhi.
15. Nayanjot Lahiri, Pre-Ahom Assam: Studies in the Inscriptions of Assam between the 5th and 13th  centuries, Delhi, 1993.
16. Kunal chakrabarti, “Cult Region : The Puranas and the Making of the Cultural Territory of Bengal”, Studies in History,2000, Delhi, pp. 1-16.
17. Hermann  Kulke, Kings and Cults: State Formation and Legitimization in India and South East Asia, Delhi 1993.
18. Upinder Singh, The Idea of Ancient India, pp. 104.

लेखक :   रिपुंजय कुमार ठाकुर


BIBLIOGRAPHY 

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