’गाँव-गरीब-दलित-महादलित-किसान-मजदूर-अल्पसंख्यक-हिन्दू-मुसलमान’

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“किडनी पर ज्यादा लोड मत लो राजू…..मैंने पहले ही समझाया था….शहर छोड़कर गाँव मत आओ…जब-तक सूट-बूट में हो तभी तक सरकार है, हमारी तरह लुंगी-गंजी-कुदाल से पहचान होगी तो सिर्फ सरकारी जुबान में रहोगे…’गाँव-गरीब-दलित-महादलित-किसान-मजदूर-अल्पसंख्यक-हिन्दू-मुसलमान’….पर तुमने मेरी सुनी कहा….अब भुगतो”

“हद है इस्माइल चाचा…कहता है काम तो बहुत अच्छा कर रहे हो आप राजू साहब…. पर आपके लिए ऐसे कोई थोड़ी अच्छा रिपोर्ट लिख देगा….मेहनत और रिस्क का काम होता है किसी के बारे में अच्छा लिखना….आज आप सही हो….पर कल अगर चोर बन गये तो ? फोटो दिखाता है चोर-चुहार की….और बोलता है देखिये फलानां भी मेरे आगे हाथ जोड़ते हैं….सबका यही हाल है चाचा….फिक्स रेट है…फसल क्षति-सिचाई अनुदान चाहिए तो ३० प्रतिशत, मशीन खरीदना है तो ६ प्रतिशत, टैक्स विभाग १५ प्रतिशत, केसीसी २० प्रतिशत, लाइसेंस पांच हज़ार….सब जगह एजेंट बैठा है..फिक्स प्राइस के टैग के साथ… कभी-कभी तो लगता है कि किस जन्म में ऐसा पाप कर लिए जो अभी ऐसा प्रायश्चित कर रहे हैं….कहता है पंद्रह हज़ार का मोबाइल हाथ में लिए घूम रहे हैं…..अब बताओ चाचा इनलोगों की दिक्कत क्या है?”

“देखो राजू बेटा…किसानी करनेवाले दो तरह के लोग होते हैं….झुलसा हुआ चेहरा….फटी हुई लुंगी-धोती….मटमैला रंग…जो चिलचिलाती धूप में खेत में सुबह से शाम गुजारता है, फिर औने-पौने भाव में अपना उपज बेच देता है…और माँग-चांग कर घर-परिवार चलाता है…मजूरी करता है…दूसरा किसान सरकार-भक्त जो दिनभर ऑफिस-ऑफिस घूमकर बाबू चालीसा पढ़ते रहता है…|”

“पर….चाचा..”

“तुम तो दुसरे किसानों के भी विकास के लिए काम करते हो….इनके लिये किसान के लिए काम करनेवाले की अपनी छवि है…भैया पुराना मैल वाला कुर्ता-पैजामा, बंडी….पैर में चप्पल….कंधे पर झोला….दाढ़ी बढ़ी हुई…बाल बिखरे हुए…बहुत ज्यादा तो एक नोकिया ११०८ मोबाइल….और तुम जाते हो साफ़-सुथरे कपड़े में…चिकना बनकर….नहीं सुनेगा तुम्हारा….वो स्मार्ट है इसलिए सरकारी है…तुम उसके सामने स्मार्ट कैसे बन सकते हो..या तो ‘सिस्टम’ से जाओ या संघर्ष करो…”

ganw

“हम तो लोटा भर पानी लेकर आये थे चाचा, हमको कहाँ पता था की यहाँ पड़ोसी के लिए पहले टंकी लगानी होगी…६ महीने से दौड़ रहा हूँ….कभी ये कागज़ लाओ…कभी वो कागज लाओ…कभी उस साहब कभी उस बाबू के पास….इस टेबल से उस टेबल…इस ऑफिस से उस ऑफिस….दौड़ते रहो…| खुलकर माँगता है शाला….बोलता है ‘राजू साहब आपने देखा ना रमाशंकर बाबू सिस्टम से आये तो तुरत काम हो गया पर आप पढ़े-लिखे लोगों की तो आदत है कि पहले बुद्धि प्रदर्शन करोगे ही…अरे भैया आपका भला कर हम आप पर एहसान कर रहे हैं..आप कुछ देकर ये एहसान चूका दो..हिसाब बराबर…हमलोग तो बैठे ही हैं गाँव-गरीब-किसान के भले के लिए…’ बड़ा मुश्किल है चाचा…”

“अरे बेटा….ये जो सरकारी मुलाजिम होते हैं ना…इनमें से अधिकांश मणिकर्णिका घाट का राजा है, बिना कुछ लिए हरिश्चंद्र को भी नहीं छोड़नेवाला….पर बेटा उम्मीद रखो….अब तुम अकेले नही हो….तुम्हें देखकर और भी लोग आये हैं…धीरे-धीरे फिर से गाम बस जाएगा….और सरकार भी ‘सरोकार’ बन जाएगी…”


लेखक : अविनाश कुमार / http://beparwah.in/

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