ये दिल्ली है मेरी जान !

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gunjan shreevicharbindu के इस अंक में प्रस्तुत है | यूवा कवि गुंजन श्री की हिंदी कविता “ये दिल्ली है मेरी जान”

ये दिल्ली है मेरी जान

1.
मैं जब कभी भी गुजरता हूँ
इस शहर के उन जगहों से
तो मुझे पुकार लेती हैं
वे सारी जगहें
जो कभी हम-दोनों के
स्पर्श से आवेशित थे,

मेट्रो से लिफ्ट तक की
हमारी-तुम्हारी
वो सारी तथाकथित
अश्लील हरकतें,
मुझे फिर-फिर मजबूर करती हैं
लौटने को तुम में
लेकिन मैं
वही खड़ा निहारता हूँ
उन सभी स्पर्शों को
जिन में तुम्हारे होने का ख़ुमार था,

बेलौस मुहब्बत से लबरेज इस शहर में
मैं अक्सर खोजता हूँ ‘उस’ शहर को
जो ‘होने’ से होता था,
क्रमशः ढूंढ ही रहा हूँ
ढूंढ़ता ही रहूँगा…!!

gunjan shree
“गुँजन श्री”

2.
इस शहर की नागिन जैसी सड़कें
मुझे अक्सर लगती है बड़ी जहरीली
क्योंकि इसी ज़हर में सने हम-तुम
उतारते थे अपना-अपना ज़हर
एक-दूसरे के होंठों में,

मगर अब ये ज़हर जवान हो गया है
और अक्सर डस लेता है मुझे
मैं झेल जाता हूँ इस दंश को
और फिर खेलता हूँ जहर को
और तब तक खेलता हूँ
जब तक की थक के चूर ना हो जाऊं

असल में मैं खुद से थककर
तुममें विश्राम करना चाहता हूँ !!


*गुंजनश्री*

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