तंग आ गए हैं कशमकश-ए-ज़िन्दगी से हम !

गुरुदत्त उर्फ़ वसंत शिवशंकर पादुकोन को हिंदी सिनेमा का सबसे स्वप्नदर्शी और समय से आगे का फिल्मकार कहा जाता है। वे वैसे फिल्मकार थे जिनकी तीन फिल्मों – ‘प्यासा’, ‘साहब बीवी गुलाम’ और ‘कागज़ के फूल’ की गिनती विश्व की सौ श्रेष्ठ फिल्मों में होती हैं।

guru dutt

1944 में प्रभात फिल्म कंपनी में नृत्य निर्देशक और फिर सहायक निदेशक के रूप में अपनी फिल्म यात्रा आरम्भ करने वाले गुरुदत्त स्वतंत्र रूप से देवानंद की नवकेतन फिल्म कंपनी की दो फिल्मों – ‘बाज़ी’ और ‘जाल’ का निर्देशन कर चर्चा में आए । गुरूदत्त को अपार लोकप्रियता मिली 1955 की फिल्मों ‘आरपार’ और ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ से। निर्माता, निर्देशक, अभिनेता के तौर पर उनकी फिल्म ‘प्यासा’ हिंदी सिनेमा का मीलस्तंभ बनी। ‘प्यासा’ में नायक की भूमिका के लिए उन्होंने दिलीप कुमार को आमंत्रित किया था, लेकिन दिलीप साहब के इन्कार करने के बाद उन्होंने एक चुनौती की तरह खुद यह भूमिका निभाई। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास बना। उनकी कुछ अन्य प्रमुख फ़िल्में हैं – बाज़, सैलाब, हम सब एक हैं, सौतेला भाई, कागज़ के फूल, चौदवी का चांद,साहब बीवी गुलाम, भरोसा, सांझ और सवेरा, बहुरानी आदि। उनमें से ज्यादातर फिल्मों का या तो उन्होंने खुद निर्माण किया या निर्देशन।

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गुरुदत्त फिल्मकार के रूप में जितने सफल रहे, भावनात्मक अस्थिरता की वज़ह से अपने व्यक्तिगत जीवन में उतने ही असफल। चौथे दशक में उन्होने दो शादियां की – पुणे की विजया और हैदराबाद की सुवर्णा से। दोनों शादियों के असफल हो जाने के बाद उन्होंने 1955 में पार्श्वगायिका गीता दत्त से ब्याह रचाया। कई वर्षों तक यह रिश्ता बेहतर चला, लेकिन इस रिश्ते के बीच आ गई खुद गुरुदत्त की खोज और उनकी कई फिल्मों की नायिका वहीदा रहमान। दांपत्य और प्रेम का यह त्रिकोण फिल्म इतिहास का सबसे दुखांत त्रिकोण साबित हुआ। गीतादत्त से अलगाव हुआ और सामाजिक दबाव में वहीदा जी ने भी उनसे दूरी बना ली। गहरे अवसाद की हालत में वे शराब और सिगरेट में डूब गए। अत्यधिक नशे की हालत में ही 1964 में उनकी मौत हुई। शायद आत्महत्या ! कुछ वर्षों बाद तनहाई, शराब और लीवर की बीमारी ने गीतादत्त को भी निगल लिया।


हिंदी सिनेमा के महान फिल्मकार, लेकिन बेहद उदास शख्सियत गुरुदत्त के जन्मदिन (9 जुलाई) पर उन्हें हार्दिक श्रधांजलि, उनकी फिल्म ‘प्यासा’ के लिए लिखी साहिर की ग़ज़ल के साथ !

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम
ठुकरा न दें ज़हां को कहीं बे-दिली से हम
मायूसी-ए-मआल-ए-मोहब्बत न पूछिए
अपनों से पेश आए हैं बेगानगी से हम
लो आज हम ने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम
उभरेंगे एक बार अभी दिल के वलवले
गो दब गए हैं बार-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी से हम
अल्लाह-रे फ़रेब-ए-मशिय्यत कि आज तक
दुनिया के ज़ुल्म सहते रहे ख़ामुशी से हम
हम ग़मज़दा हैं लाएं कहां से ख़ुशी के गीत
देंगे वही जो पाएंगे इस ज़िन्दगी से हम

आलेख : पूर्व आई० पी० एस० पदाधिकारी, कवि : ध्रुव गुप्त

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