जुवेनाइल मुहब्बत

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Vikash Vatsnabhसमय की करवटों ने बहुत कुछ बदला है । लड़के अब ड्यूड और लड़कियाँ बेब्स कही जाने लगीं हैं । पॉकेट मनी सीसीडी और पब को नशीब हो रहा है । खतों की सिसकियाँ रिंगटोन में बजने लगी है । हर जगह..

नया स्वेग ढूंढा जा रहा है । कालोनी से सुलगता इश्क कॉलेज को डेजल कर रहा है । इसी नोट पर कवितायें भी लीखि जाने लगीं हैं । अपने अल्हड़पन में मस्त और फ़ीलिंग से लबरेज ।

नये दौर के आशिक, नयी मिजाज की बातें । कुछ इन्हीं चेन ऑफ़ फीलिंग्स और इश्क के हैंगओवर की कविता है ‘जुवेनाइल मुहब्बत’। यादें और तन्हाई की पेंटिंग यहाँ भी है बस रंग कुछ नये हैं । बिल्कुल आपके करीब, आपसे रूबरू होती इश्क वाली नयी स्टार्टअप का इन्वेस्टमेंट और आउटकम की कविता । पढ़िए तो जरा…


“जुवेनाइल मुहब्बत”
 
ये जो कुछ महीनें हैं अनारकली
जनवरी – फरबरी
अगस्त और अक्टूबर
इन्हीं महीनों
थोड़ी ज्यादा रंगीन हो जाती है
अपनी जुवेनाइल मुहब्बत
 
तुम्हारी पानीपुरी की कंजूसी से
मेरे बेतरतीब हैंगर पर लटक जाता है
एक ब्रांडेड जीन्स
जिसे बर्थडे के तीन महीने बाद
तुमने तोहफे में
खरीदा है मेरे लिए
और तुमसे जो चिपक के सोया है
वो गबरू टेडी
जिसे हॉलमार्क में गोद लिया था तुमने
उसके फुले हुए पेट में
भर जाता है मेरे गोल्डफ्लेक का धुआँ
मेरी चाय की कटौती का जायका
मेरे रजनीगंधा-तुलसी की कंबाइंड खुशबू
 
कितना दिलकश होता था
सुबह से शाम तक
शहर की चौहद्दी खंगालना
मोल-भाव करते भागते रहना
ट्रायल बेसीस पर हर आमोख़ास रेस्टो में हाजरी लगाना
और पार्क में घंटो सुस्ताने के बाद
कशमकश की थकान लिए
ओला के बैक सीट पर कुछ और थक कर
देर शाम होस्टल पहुँचना
फिर डोकोमो की अनलिमिटेड नाइट पैक से
रात को सुबह करना
 
इस प्यार वाले गुनगुने मौसम में
जबकि ऊसर परे खेतों में
खिल आया है सरसों
और महुए ने पूछा है तुम्हारी परफ्यूम की ब्रैंड
तब तुम्हारी अनहद यादें
और तुम्हारे कुछ पुराने सामान पर जमी धूल को
पोंछने लगी है मेरी कविता
Vikash vatsnabh
“युवा कवि विकाश वत्सनाभ”
फिर से याद आने लगा है
इथिनिक परिधान में तुम्हारा वो देसी स्वेग
वो पेराबोला वाली सेल्फ़ी
वो लेकमी की डेड ब्लैक काजल
और शानिया मिरजा वाली मारूक नथुनियाँ
 
बहुत मिस करता हूँ अनारकली …
आओ ना एकदफा फिर से
किसी भटके हमनसीं की तरह
ये प्रोमिश रहा यारा
एक माँ की तरह बेइन्तहां प्यार दूंगा तुम्हें
की जिसे और भी प्यारा हो जाता है
कुम्भ में भटका,
और फिर वापस मिला उसका बेटा…

लेखक : विकाश वत्सनाभ


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