कविता “चुप्पी” और “युद्धउन्माद” !

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rajanish_priyadarshiप्रिय पाठकों प्रस्तुत है । कवि रजनिश प्रियदर्शी की नवोदित हिंदी रचना ( कविता “चुप्पी” और “युद्धउन्माद” ) जो सामाजिक और राजनितिक वर्तमान परिदृष्य पर लिखी गई है । पढ़ें …

” चुप्पी ”

तुम्हारी औकात !
तुम्हें पता है
तूम नहीं खरीद सकते महंगी किताबें
नहीं रह सकते शहर के प्राइवेट लॉजों में
नहीं खा सकते बाहर का महंगा खाना
कुछ सुविधाएँ मिलना तुम्हारा अधिकार है
जिसे तुम्हारी औकात देख कर
राज्य ने तय कर रखा है
जो तुम्हें नहीं मिल रहा है

तूम झूठी शान दिखाने में व्यस्त हो
पर तुम्हारे पिता बेचते हैं अपनी जमीन
तूम खरीदते हो महँगी किताबें
रहते हो शहर के प्राइवेट लॉज में
खाते हो बाहर का महँगा खाना
ये तुम्हारी विवश्ता है ।
फिर भी !
तूम चुप थे,
और आज भी चुप हो !

 

मैं पूछता हूँ ?

कब टूटेगी तुम्हारी चुप्पी’ ?
कब तक बघारते रहोगे झूठी शान ?
कब कलकलायेगा तुम्हारा कलेजा ?
कब करोगे तुम प्रतिकार ?
जिसके आर में
काला हो गया तुम्हारा अतीत
और हो सकता है काला
भविष्य भी !

© रजनिश प्रियदर्शी


“युद्धउन्माद”

जहाँ से शुरू होते हैं
हमारे तुम्हारे दलहिज
हम-तुम वहाँ करेंगे तांडव
मारे जाएंगे हजारों जवान
लाखों दिए जलेंगे शहीदों के नाम !

राष्ट्र प्रतिरोध की ज्वाला से भभक रहा है
जिसके कारक हैं कुछ विष वृक्ष
फैला रहा है राजनीतिक दंश
चंद चापलूसों का अनोपचारिक विचार है
युद्धउन्माद’ ही लाएगी राजनितिक’ स्थिरता !

मैं पूछता हूँ !
क्यों नहीं ? उखाड़ते हो यह विष-वृक्ष
जो बनता जा रहा है वट-वृक्ष
फैला रहा है राजनीतिक दंश
और एक दिन हम-तुम बनोगे
प्रलयंकारी
युद्ध ! का अंश !

© रजनिश प्रियदर्शी

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