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मार्क्स के आधारभूत सिद्धांत का समर्थक हूँ, समर्थकों का समर्थक नहीं ! - Vichar Bindu

मार्क्स के आधारभूत सिद्धांत का समर्थक हूँ, समर्थकों का समर्थक नहीं !

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दुनिया में चारो तरफ शोषण व्याप्त था, मजदूरों का शोषण । उनके न तो काम के घंटे निश्चित थे और न ही कोई निश्चित मजदूरी । छुट्टियों का तो सवाल ही छोड़िये । यहाँ तक की यदि किसी मजदूर/कर्मचारी की मृत्यु हो जाए या वो कारखाने में कार्य के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो उसे कोई मुआवजा भी नहीं मिलता था ।

इसी बीच ज़र्मनी में जन्म हुआ एक महामानव का । वो दार्शनिक था, हेगेलियन दार्शनिक (जॉर्ज फ्रेडरिक हेगेल का अनुसरण करने वाले) । उन्होंने हेगेल के द्वंदवाद को समाज के तत्कालीन परिस्थिति पर लागू किया और सामने आया “भौतिकवादी द्वंदवाद” । वर्षो के वैचारिक मंथन के बाद “वैज्ञानिक समाजवाद” के रूप में उनका सिद्धांत सामने आया जिसकी अंतिम परिणति होनी थी “साम्यवाद” के रूप में ।

पूरी दुनिया में क्रांति आ गयी । दुनिया के लोग और देश अब दो ही तरफ खड़े नज़र आने लगे : या तो मार्क्स के साथ अथवा मार्क्स के खिलाफ । पहले जो भी सिद्धांत थे और विभिन्न किताबें थीं, इतिहास था, दुनिया का भूगोल था, वो सब बदल गया। सभी जगह दो धाराएं हो गयीं । जगह जगह मजदूरों ने अपने संगठन (यूनियन) बनाये और अब वो मजबूती के साथ अपने पूंजीपति मालिकों की मनमानी के खिलाफ अथवा सरकार की मनमानी के खिलाफ उठ खड़े हुए । दुनियाभर के मजदुर एकजुट हो गए, अपनी बेड़ियां तोड़ने को । मजदुर संगठनो की मजबूती के आगे पूंजीपतियों को झुकना पड़ा ।

आज चाहे सरकारी कर्मचारी हों या निजी क्षेत्र के कर्मी, सभी के काम के घंटे निश्चित होते हैं, वेतन निश्चित होते हैं, छुट्टियां मिलती हैं, चिकित्सा सुविधाएँ मिलती हैं और अन्य जो भी सुविधाएँ आज मिलती हैं वो सब देन है उस महामानव के विचारों का ही और उन विचारों के फलस्वरूप आयी जनचेतना का ।

Karl Marx

मैं आज उन महापुरुष “श्रीमान कार्ल हैंरिच मार्क्स” को उनके 200 वें जन्मदिवस पर अपने तरफ से हार्दिक बधाई देता हूँ (श्रधांजलि नहीं दे रहा, क्योंकि मार्क्स तबतक जीवित हैं जबतक समाज में कहीं भी असमानता जीवित है अथवा शोषण जीवित है) ।

लेकिन इन सिद्धांतों के साथ ही जुड़े हुए हैं कुछ सवाल भी और ये सवाल श्रीमान मार्क्स अथवा उनके सिद्धांतो से जुड़े हुए नहीं हैं, बल्कि जुड़े हुए हैं मार्क्स के अनुसरणकर्ताओं से और उनके द्वारा मार्क्स के सिद्धांतो को जिस तरह लागू (प्रैक्टिस) किया गया, उन तरीकों से ।

सवाल उठते हैं स्टालिन जैसे उनके भक्तों पर जिन्होंने अपने सभी विरोधियों को हमेशा के लिए चुप करा दिया (हत्या करके), सवाल उठता है माओ पर जो बन्दुक के दम पर सत्ता हासिल करने की बात करने लगे और आज उनके चीन में 150 करोड़ लोगों में से मात्र 8 करोड़ लोगों को ही मौलिक समानता अधिकार प्राप्त है (वोट देने के अधिकार की समानता) । क्या माओ मार्क्स की बातों को इस स्तर तक नहीं ले गए, जहाँ अगर कोई देश में लोकतंत्र की मांग करे तो उसपर टैंक चला दिया जाए (थियाएनमेन चौक घटना) ? क्या मार्क्स यही देखना चाहते थे ?

क्या मार्क्सवाद को मानते – मानते उत्तर कोरिया आज जहाँ पहुँच गया है, मार्क्स उसे वहीँ देखना चाहते थे ? एक देश (क्यूबा) में दो भाई ही मार्क्स के नाम पर सदियों तक शासक रहे, और आज जब उनकी सत्ता ख़त्म हो रही है तो वहां अराजकता फ़ैल गयी है ? एक देश (वेनेजुएला) में जबतक साम्यवादी सरकार रही, तबतक सबकुछ शांत बना रहा (शायद डर से), और आज जब ह्यूगो शावेज नहीं हैं तो वहां आर्थिक आपातकाल वाली स्थिति आन पड़ी है । क्या मार्क्स के हिसाब से सर्वहारा के हाथ में सत्ता आने के यही मायने थे ?

क्या मार्क्स कुछ जाती विशेष के लोगों को ही सर्वहारा मानते थे (सन्दर्भ : मंडल आंदोलन, भारत) ? क्या आज भारत में फैले मार्क्सवादी विद्रोही (नक्सलवादी तथा माओवादी वगैरह) जिन पुलिसवालों अथवा सुरक्षाकर्मियों को मार रहे हैं, वो सभी बुर्जुआ (पूंजीपति) समुदाय से हैं और क्या मार्क्स उनकी हत्या को जायज ठहराते ?

सवाल तमाम हैं और स्थिति यहाँ तक पहुंच गयी है की यदि आज मार्क्स साक्षात् भी आकर अपने इन शागिर्दों को रोकें, तो वो शायद मार्क्स को भी गोली मार दें । याद रखिये, मार्क्स “वैज्ञानिक समाजवाद” की बात करते थे, और कोई जड़ सिद्धांत वैज्ञानिक नहीं हो सकता । इसका अर्थ ये हुआ की दुनिया के हर देश की परिस्थिति अलग अलग है और वहां एक ही सिद्धांत को एक ही तरीके से लागू नहीं किया जा सकता (खुद मार्क्स ने भी एशिया के लिए अलग से “एशियाटिक मोड ऑफ़ प्रोडक्शन” की चर्चा की थी) । इसके अलावा पिछले 200 सालों में पूरी दुनिया की तश्वीर बदली है और उसी हिसाब से मार्क्स के वैज्ञानिक सिद्धांतो में भी सुधार होने चाहिए ।

मार्क्स सशरीर होते तो शायद यही करते ।

नोट :-कहा जाता है की “यदि आप 40 साल से कम के हैं और मार्क्सवादी नहीं हैं तो इसका मतलब आपके पास दिल नहीं है और यदि आप 40 साल से ज्यादा के हैं और तब भी मार्क्सवादी बने हुए हैं तो आपके पास दिमाग नहीं हैं । मेरी उम्र 40 साल से कम है और मैं संघी होने के वाबजूद मार्क्स के आधारभूत सिद्धांत (जो कागज पर मौजूद हैं) का बड़ा समर्थक हूँ, मार्क्स के समर्थकों का समर्थक नहीं । इस आलेख की यही प्रेरणा है, कृपया इसे अन्यथा न लिया जाए ।


साथ ही मार्क्स के 200 वें जन्मदिवस पर बीबीसी की ये रिपोर्ट भी पढ़िए :-  मार्क्स की वो 5 बातें, जिनसे बदली हमारी ज़िंदगी


आलेख : व्योमेश विभव झा

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