एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं

इस आलेख में, हिंदी मैथिली के प्रखर युवा कवि विकास वत्सनाभ छात्र आन्दोलन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान और भविष्य के सामंजस्य का साधारण बोध करवाते हुए प्रतीत होते हैं । पढिये एक स्पष्ट चिंतन पर आधारित यह आलेख “एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं”

आंदोलन, अनसन, लोकतंत्र, राष्टवाद, भोंट और चुनाव इक्कीसवीं सदी के कुछ प्रमुख व्यामोहक शब्द हैं। शब्दों की प्रवृत्ति और स्वरुप में परिस्थिति और परिवेश के अनुसार व्यापक भिन्नता है। इसके विविध आयाम को रामलीला मैदान से लेकर एलएनएमयू के दालाना तक हमने महसूस किया है। एक साम्यता भी यहाँ दृष्टिगत हैं, जो इन आन्दोलनों की पृष्ठ्भूमि है, वह है  स्थापित व्यवस्था में निहित अराजक तंत्र के खिलाफ विद्रोह की प्रवृत्ति । आंदोलन से सुलगने वाली क्रांति का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सरोकार इन्हीं स्थापित अराजक मान्यताओं को तोड़कर नव्यतम परिवेश की स्थापना करना है जहाँ वंचित अधिकारों की समुचित उपलब्धता को सुनिश्चित किया जा सके। स्वतंत्रोत्तर भारत में सामाजिक परिवर्तन के लिए हुए आन्दोलनों में छात्र की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। अधिकाँश छात्र आंदोलन छात्रहितों की सम्यक वकालत तक ही सिमित रहे किन्तु इन्हीं में से कुछ आन्दोलनों  ने देश की राजनीति और व्यवस्था को अप्रत्यासित रूप से प्रभावित भी  किया। १९७३ में गुजरात विश्वविद्यालय में मेस के शुल्क में हुयी वृद्धि के विरुद्ध हुआ छात्र आंदोलन अपने अधिकार के लिए किए गए संघर्ष का एक मिशाल स्थापित करता है तो वहीं १९७४ में पटना विश्वविद्यालय से आरम्भ हुआ जेपी आंदोलन एक महत्वपूर्ण नाम है जिसने राजनीति और समाज दोनों को सम्यक रूप से प्रभावित किया और एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन का स्वरुप ले लिया। इस आंदोलन में भी महती भूमिका छात्रों की हीं थी।

छात्र आंदोलन एक मजबूत लोकतंत्र का प्रथम आधार है। इस के जरिए युवाओं का राजनीति से परिचय होता है तथा राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान करने वाली संभावनाओं की नींब मजबूत होती है। यह विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय है कि एक ओर तो युवाओं को लोकतांत्रित प्रणाली में सक्रीय होने के लिए उनसे मतदान की अनुशंसा की जाती है और दूसरी ओर विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव को रोककर उन्हें प्राथमिक लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है। अधिकाँश विश्वविद्यालयों में छात्र संघ की उपस्थिति मात्र एक औपचारिकता भर है और जहाँ सक्रियता है भी वहाँ वर्षों से छात्र संघ चुनाव बंद है। सत्ता मदांध है और शैक्षणिक प्रशासक स्तुतिगान में तल्लीन हैं। अधिकारों की मांग को गैर लोकतांत्रिक कहकर पल्ला झाड़ना एक आम व्यवहार बन चुका है। छात्र मूलभूत सुविधाओं के मोहताज बनकर विश्वविद्यालयों में सक्रिय शैक्षणिक गुंडों के हाथों शोषित होने के लिए बाध्य हैं। शिक्षा एक व्यवसाय के रूप में काबिज है और लाखों की तनख्वाह उठाते प्रोफ़ेसर विश्वविद्यालय को एक औपचारिक शिक्षण केंद्र के रूप में स्थापित कर रहें हैं।

इस आलोक में एक विश्वविद्यालक की परिचर्चा प्रासंगिक है। यह है दरभंगा का “ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय”। पिछले चालीस वर्षों से यहाँ छात्र संघ चुनाव बंद है। परिणाम यह है कि ना तो नियत समय पर सत्र का संचालन हो रहा है और नाहीं पठन-पाठन की सम्यक व्यवस्था है। शिक्षा और समय दोनों रूप से शोषित होने के लिए छात्र विवश हैं। विश्वविद्यालय में अराजकता और अवैध वसूली एक सर्वस्वीकृत सत्य बन गया है। विश्वविद्यालय की इस दयनीय स्थिति ने मिथिला को सर्वाधिक प्रभावित किया है। आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावकों के लिए शिक्षा का एकमात्र विकल्प यह विश्वविद्यालय, अपनी लचर शिक्षण प्रणाली से मिथिला को पलायन और प्रवास के उपनाम के रूप में स्थापित किया है। सरकारें बदलती रहीं हैं, किन्तु पतोन्मुखी होना इस विश्वविद्यालय का नैसर्गिक प्रवृत्ति बनता गया।

LNMU

क्षेत्रीय शिक्षा का लाइफलाइन कहा जाने वाला यह कैंपस अपनी बदहाली का मूकदर्शक बनकर जब ऊँची दीवारों और आलिशान भवनों से अपनी नियति पूछता है तब इन दीवारों से एक चीख निकलती है। यह चीख भविष्य की भ्रूणहत्या और वर्तमान के बेघर होने की चीख है। यह मिथिला के उन कर्णधारों की चीख है जिन्हें आज तक अनसुना किया गया है और उनकी पीड़ा को सत्ता की दुंदभि में दबाया गया है। बाबजूद इसके, छात्र मौन,अभिभावक गौण,राजनीती बस ऑन नजर आती है। जब छात्र संगठन और राजनितिक धुरंधर इन परिस्थतियों से बेखबर, आँखें मूंद कर अपने प्रशस्तिगान में मसगुल थे तभी इस अराजक व्यवस्था के खिलाफ, मिथिला के छेत्र और छात्र के विकास के लिए, कुछ नवतुरिया कृतसंकल्पित हो रहे थे। छात्रों के उनके हितों और अधिकारों की अंतिम पाठ पढ़ा कर विश्विद्यालय जब वैचारिक कूटनीति का ठहक्का लगा रहा था तभी उसने वो देखा जिसकी परिकल्पना मिथिला के लिए मिथक ही बनी हुयी थी। एक नवजात संस्था ने विश्वविद्यालय कैम्पस में छात्र आंदोलन का आह्वान कर दिया था। सैकड़ों की संख्या में छात्र पीताम्बरी परिधान में विश्वविद्यालय कैम्पस में कूच किए थे। अपनी विरासत और लोक संस्कृति में आत्मसम्मोहित मिथिला में यह क्रांति का पहला वसंत बन कर आया। दरभंगा की गलियों ने यह महसूस किया की क्रांति अभी भी उसकी जमीन में कहीं छिपी हुयी है।

इस आंदोलन की अभूतपूर्व सफलता के परिणामस्वरूप विश्वविद्यलाय प्रशासन ने छात्र चुनाव की विधिवत घोषणा की। घोषणा क्या हुयी कि जैसे कि मधुमक्खी के  घर  किसी ने गुलेल फेंक दी हो। रातोंरात  विमर्श के मुख्यधारा में विकास प्रकट हो आया। छात्र हितों की रक्षा गीता और कुरान बन गयी। घोषणा पत्र इतना राष्ट्रवादी हो गया कि मिथिला के हितों की मांग करने वाले कुछ नवयुवक कश्मीरी  पत्थर फेंक करार दिए गए। विश्वविद्यालय कैम्पस से निकलकर कलेजा में घर कर गया। पंचायत से विधानसभा तक निर्वाचित व्यक्ति सक्रीय हो गए। सिकंदर को यह भान हो आया की पोरस ने आँखें खोल दी है।  कुल मिलाकर माजरा यह बना की छात्रहितों की वकालत प्रमुख राजधर्म बनकर मिथिला के सन्मुख हुआ। विश्वविद्यालय को एक लोकतांत्रिक परिवेश देना और छात्रों के अधिकारों को सुनिश्चित करना कुलगीत बन गया। और यूनियन की पहली जीत यहीं परिभाषित हो गयी।

यूनियन के सेनानियों ने पिछले कुछ दिनों में अपनी विचारधारा के अनुकूल क्षेत्र और छात्र का विश्वास जीता है। यह पिली क्रांति के रूप में जुकरबर्ग की गलियों से गुजरता हुआ मिथिला की जमीन पर मजबूत हुआ है। इसे समृद्ध रैयाम की आँशु पोंछते, यजुवार को प्रकाशित करते, नैंसी का न्याय माँगते और बाढ़ की विभीषिका से आप्लावित मिथिला की मरहम पट्टी करते हुए आपने भी देखा होगा। संसाधन की कमी के बाबजूद भी संघर्ष को परिभाषित करना इन्होंने सीखा है। ये मिथिला की धरती पर उम्मीद के वो कुसुम हैं जिन्हें यह एहसास है कि इनकी फुलवारी को कितने बेरहमी से रौंदा गया है, खाध-पानी से वंचित रखा गया है और जड़ों में सेंध मारकर ठूठ करने की कोशिश की गयी है।

आज छात्र संघ चुनाव में ‘मिथिला स्टूडेंट यूनियन’की जीत  हासिये पर ढकेले गए उस मिथिला की जीत  होगी जिसका उपयोग सत्ता के गलियारों तक पहुँचने मात्र के लिए किया जाता रहा है। यह जीत एक विराट भविष्य की नींब रखेगी जहाँ मिथिला समवेत स्वर से अपने वंचित अधिकारों की मांग करेगा और वो सब प्राप्त करेगा जिसका वह हकदार है। इसलिए भी यूनियन का जीतना  आवश्यक है कि कहीं एकबार फिर ‘मिथिलावाद’ महज मजाक बन कर न रह जाए। यह जीत इसलिए भी आवश्यक है कि कहीं कुदाल चला रहे पिता मजबूर होकर बेटे को दिल्ली न भेज दें।

दोस्तों हमने क्रांति के नाम पर बहुत कुछ नहीं किया है। बौद्ध मताबलम्बियों और कंदर्पी घाटियों की गिनती करते हमारी अंगुलियां ख़त्म हो जाती है। हमरा परिवेश एक समृद्ध वैचारिक परिवेश अवश्य रहा है किन्तु भाषा की मिठास हमारे शोणित को भी मीठा कर गया । चीटियाँ हमारे स्वाद से सम्पुष्ट और सामर्थ्यवान होते रहें और हम खोखलेपन के शिकार हो गए। शोषित होना हमने अपना मौलिक कर्तव्य समझ लिया। भाषा, संस्कृति और विरासत को ख़त्म करने की चाल में वो सफल होते गए। हम तब भी मौन रहे। लेकिन यह मौन घातक है और आततायीओं  के मस्तिष्क पर इस बात की गवाही भी की हमने लड़ना छोड़ दिया है। ग्लोबल परिवेश में आज मिथिला की लोकल स्मिता खतरे में हैं।

यूनियन से हमारी आपकी वैचारिक भिन्नता हो सकती है। कार्य करने की शैली नापसंद हो सकती है। लेकिन विकल्प जब एक हो तो वही स्वीकार करना श्रेयकर होता है। मिथिला के लिए यह विकल्प ‘मिथिला स्टूडेंट यूनियन’ ही है। आपसी रंजिश से उपर उठकर एक बार अपनी स्मिता के लिए साकांक्ष होइए। ‘मिथिलावाद’ को मजबूत कीजिए।


( नेरुदा की चिली को मिथिला की नजर से देखते हुए कुछ पंक्ति )

एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं
वे सब तुम्हारा समर्थन करते हैं
क्योंकि तुम प्रतिनिधि हो
हमारी लम्बी लड़ाई के
सामूहिक सम्मान के
और अगर ‘मिथिला’ हारता है
तो हम सभी हारेगें
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विकाश वत्सनाभ
२३/०२/२०१८


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