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मन में उमड़ता यादों का सावन

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डायरी के पन्नों से  – ‘मन में उमड़ता यादों का सावन’, विश्व साहित्य से लेकर अपने लोक भाषा के साहित्य में रूचि रखने वाले बालमुकुन्द एक समीक्षक, आलोचक, कवि एवं प्रेम से भींगे हुए इंसान हैं । और ये इंसान जब कभी प्रेम की बात लिखता है तो लगता है कि कहानी का सारा किरदार बिखरकर हमारे आसपास आ गया है….

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“मन में उमड़ता यादों का सावन”

कहते हैं ना सावन प्रेमीयों का महीना है। वो भी औढ़रदानी कैलाशपति भोलेनाथ के प्रेमीयों का । जहाँ इस माह हमें प्रकृति का विविध रंग देखने को मिलता है वहीं सड़क भी ज्यादातर गेरूए रंग में सने लोगों से भरा-परा दिखलाई पड़ता है । उसे ना, उनका चलते-चलते ‘बोलबम-बोलबम’ का नारा लगाना बेहद पसंद पड़ता है । कहते हैं कि काँवरियों में गजब का विश्वाश, बाबा के प्रति अटूट श्रर्द्धा, अद्भूत ताकत का संचार होता है इससे । बाबा नगरिया की राहें आसान हो जाती है । थकावट जाती रहती है शायद । खैर, इन सबका अनुभव नहीं रहा है उसका । उसके लिए तो सावन; याद, कविता और प्यार एक संग साथ-साथ जीने का मौसम है । कितना कच्चा हो जाता है मन, सावन में । जब बर्षा के पानी की बूंदें पेड़ो से छनकर छम-छम करती हुई जमीन पर गिरती है, तब मिट्टी से मिलकर आती उसकी सोंधी सुगंध दिलों-दिमाग पर अजीब हीं नशा करती जाती है । और फिर ना चाहते हुए भी उन लम्हों में मन फिर से उतरने लगता है । जिन लम्हों में प्रेम है, विरह है, यादें है और टीस भी । आसमान में चम-चम कर चमकती बिजली के संग बीच-बीच में उसका चेहरा भी चमकता है, बुझ जाता है, फिर चमकता है । बादलों में लुका-छिपी खेलते सूरज की भांति कभी दिल किसी को याद करना चाहता है, तो कभी है भूल जाना चाहता । पर भूलना क्या इतना भी आसान है ? चारों ओर छाए हुए काले बादल, सूरज का लुका-छिपी का खेल, टिप-टिप कर घरती पर गिरती बारिश की बूंदें बड़ा हीं मनोहारी वातावरण बनाती है ना। तरह-तरह के कल्पनाएं करने लगता है मन । तभी तो सावन कविता में सुमित्रानंदन पंत कहते हैं कि रूक-रूक कर सपने, सावन के महीने में जागते हैं । खैर कवि को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए ।

               फिलवक्त कथावाचक को सुनना हीं ज्यादा दिलचस्प मालूम पड़ता है । कहते हैं ना, कि उसकी प्रेमिका थी कोई । जिसके साथ उसने भी देखे थे जीवन के अनगिनत सपने । इसी सावन में । नागपंचमी के मेले घूमते हुए । एक-दूसरे का हाथ थामें उस बड़े से झूले पर बैठकर या फिर विषहरा (नाग) का खेल देखते वक्त शायद । सुना है कि आजादी के आंदोलन का दौर था वह ।और एक दिन कथावाचक अपनी प्रेमिका को मिलने जा रहा था । मगर, रास्ते में किसी अंग्रेज सिपाही ने गोली चला दी । वह वहीं मारा गया । शायद तभी से वह कजरी में गाया जाने लगा हो- एही ठइयां मोतिया हेराइ गइले रामा हो..। और यह अब तलक कजरी में जीवित है । अब बात दरअसल जो भी हो, मगर सावन में झूला और कजरी गानें की परंपरा को तो नहीं हीं झूठलाया जा सकता । जा सकता है क्या ? वह कहता है कि जाना भी नहीं चाहिए ।बाँकी कहानी यह भी कम इमोशनल नहीं है, है ना ? बिल्कुल अठखेलियाँ करती हुई बारिश के बूंदों की माफिक । और ऐसे में यादें परत-दर-परत उमड़ने लगती है अंतर्मन में । फिर कविता तो ‘याद’ हीं होती है और कवि भी तो यही करता है ना । अब चाहे किसी को याद कर-कर के कविता लिखी गई हो या कविता लिख-लिख कर याद किया गया हो । क्या फर्क पड़ता है ? पड़ता भी हो तो उसे तो बिल्कुल भी नहीं पड़ता। उसे गिरिजा कुमार माथुर की कविता के टुकड़े याद आते हैं – भूलना फिर-फिर पड़ेगा / जिंदगी भर याद कर-कर / वही एक पथ है जहाँ / हम मिट गए तुमसे बिछड़कर । बहरहाल सावन जो किसी के भीतर याद बनकर उमड़ रही है, उसमें होमर बनने से क्या फायदा दोस्तों ? अब यादें है, तो दिल में टीसेंगी ही । फिर दिल बहलाने के लिए इधर-उधर भटका जाय । खूब पढ़ा जाय। पढ़ते-घुमते में उसे खोजा जाय। मन को ठंढ़क मिलेगी । फिर प्रकृति भी कम खुशहाल नहीं है आजकल । थोड़ी खुशहाली खुद के लिए भी चुराया जाय । वो क्या तो कहते है कि, छोटी-छोटी खुशियाँ भी बड़े-से-बड़े गम पर मरहम का काम किया करती है । वैसे भी सावन है, तो गमों के बादल भी तो फटकेंगे हीं । बरसेंगे, गर्जेंगे भी ।


बालमुकुन्द
09934666988

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