“संजीदा” पति चाहिए “खरीदा” हुआ नहीं

पटना विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर शालिनी झा अपनी माँ को पत्र लिखती हैं, जिसमें  मध्यमवर्गीय परिवार की औसत लडकियाँ प्रेषक की भूमिका में प्रतीत हो रहीं हैं । “संजीदा“ पति चाहिए “खरीदा“ हुआ नहीं ।

Shalini Jha

प्यारी माँ ,

चरण स्पर्श

                      तुम्हें याद है वो दिन जब पहली बार तुम मेरे लिए फ्रॉक ले कर आई थी । कितनी खुश थी मैं ! छोटे छोटे लाल-लाल फूल बने थे उसमें, उन फूलों में तुम्हारा प्यार था । तुम जानती थी कि फूल बहुत पसंद हैं मुझे ! तुम वैसी ही हो आज भी, सब कुछ बिना कहे समझ लेने वाली ! किस बात पर मुझे रोना आता है और कौन सी बात मुझे खुशी देती है, कई बार मैं किसी बात पर अकेले में रो कर, अपने चेहरे को धोकर तुम्हारे पास आ जाती थी, नकली हँसी के साथ ! पर पता नहीं कैसे, तुम जैसे पलकों के बीच झाँक लिया करती थी, कहती “क्या हुआ ? किसी ने कुछ किया ? क्या ? रो क्यूँ रही थी बेटा ? ”  ये सिर्फ़ तुम करती आई आज तक । हर तक़लीफ़ सह कर भी मुझे सबकुछ सबसे  अच्छा देती आई, कोई कमी नहीं होने दी ।

                       मुझे लगता था कि मैं तुम्हारे पास रहूंगी, अंतिम साँस तक, इसी आँचल में, पर जब बड़ी हुई तो पता चला मेरी शादी होगी । मुझे तुमसे दूर होना होगा । हमेशा के लिए ! किसी और के पास जाना होगा, उस की दुनिया को अपनाना होगा,  पर कौन होगा वो ? तुम्हारे जितना प्यार करेगा भी या नहीं ? मेरे छुपे हुए आँसुओं को देख पाएगा भी या नहीं ? मुझे समझेगा भी या नहीं ? और मैं ये सोच ही रही थी कि, वो रिश्ता आया मेरे लिए ! मुझे लगा जैसे मैं कोई “चीज़ ” हूँ । जिसकी जाँच परख के बाद उसे खरीदने का फ़ैसला किया जाएगा । क्या रिश्ते ऐसे जोड़े जाते हैं ? और उनका वो सवाल ! “दहेज कितना देंगे आप ? ” माँ क्या मेरी पढ़ाई, मेरे गुनो का कोई मोल नहीं ?

                              माँ, क्या तुमने इतनी तक़लीफ़ उठा कर मुझे इसलिए इतना बड़ा किया ताकि पापा को मेरी वजह से ये सुनना पड़े कि वो कितने पैसे दे सकते हैं मेरी शादी क लिए ? माँ उन्हें मुझसे कोई मतलब नहीं है । पैसो से प्यार है उन्हें । मेरी तक़लीफ़ कभी नहीं समझेंगे वो । इज़्ज़त नहीं करेंगे कभी मेरी ! माँ मैं एक लड़की हूँ, और लड़की होना कोई गुनाह नहीं है । क्या बस इस वजह से कि मैं एक लड़की हूँ, तुम चुपचाप सब सहोगी ? पापा की ऐसे बेइज़्ज़ती होगी ? क्यूँ चाहिए पैसे उन्हें ? क्योंकि उन्होने अपने बेटे को डॉक्टर बनाया है ? पर वो तो उन के पास ही रहेगा ना । जाना तो मुझे पड़ेगा तुम्हें छोड़ के.. उनके साथ रहने ..! तुम उन्हें अपनी बेटी दे रही हो ! हमेशा के लिए । फिर दहेज तो तुम्हें माँगना चाहिए .. है ना ? और किस तरह का डॉक्टर है वो इंसान .. उस के सामने एक बेटी के पिता की  बेज़्जती हो रही थी वो भी बस इसलिए क्यूँ कि उन के पास दहेज देने के लिए पैसे नहीं हैं, और वो लड़का आराम से सुन रहा था । मेरे पापा की बेज़्जती की उसको ज़रा भी परवाह नही है माँ ! कैसे निभाएगा ऐसा लड़का मेरा साथ ? वो भी ज़िंदगी भर ? कैसे मेरी तक़लीफ़ को महसूस कर सकेगा ? तुम मुझे ज़िंदगी भर ऐसे इंसान के पल्ले बांधना चाहती हो ? क्या सच मे माँ ? मैं इतनी बड़ी बोझ हूँ तुम्हारे लिए ? माँ !

                    मैं तुम्हारी बेटी हूँ,  तुम्हारे संस्कारों से बनी . ! बहुत मजबूत ! शादी के खिलाफ नहीं हूँ, पर शादी तो बहुत खूबसूरत रिश्ता होता है ना माँ.. जिसमे दो लोग एक दूसरे को समझते हैं, संभालते हैं, जैसे तुम और पापा हो ! एक दूसरे के लिए ! हर मुश्किल में, ! कोई वैसा ही खोज दो माँ, जो तुम्हारी तरह हो, बिना बोले आँसू देख लेने वाला, सबकी इज़्ज़त करने वाला जिसे पैसों से नहीं, मुझसे लगाव हो, और अगर ऐसा ना मिले कोई तो माँ फिर मुझे अपने पास रहने दो ! तुम्हारा और पापा का ख्याल रखने दो ! नहीं जाना मुझे कहीं तुमसे दूर ! मैं सच में नहीं जाना चाहती !

मना कर दो उन्हें, उन ढोंगी, पैसो के लालची लोगों को… कह दो उनसे कि तुम्हारी बेटी कोई चीज़ नहीं है । वो अपने बेटे की शादी पैसों से करा दे क्योंकि उनका बेटा इंसानों से रिश्ते निभाने की हिम्मत नहीं रखता !

                                                                                                                                                तुम्हारी “बेटी”


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