त्रिशंकु वाली स्थिति है जहां ना आप मूलवासी हैं ना ही प्रवासी

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गाँव छोड़ने के बाद चित्त उद्विग्न है। गाँव में बाल सखा किशुन से मुलाकात हुई। पूछा कि आजकल क्या कर रहे हो तो जबाब दिया की इज्जत बचा कर दो वक्त की रोटी कमा रहा हूँ। तुम लोगों ने गाँव छोड़ दिया कभी खोज खबर भी नहीं लेते। किसी न किसी को तो गाँव में रहना चाहिए सो मैं गाँव में ही रहता हूँ।

गांव में रहने के दौरान एक जनेऊ का भोज खाने का मौका मिला और दक्षिणा में पीतल का एक लोटा और 101 रुपये नगद। मेरे साथ मित्र चुन्ना और अनुज वीरेंद्र बतौर इसे ट्रॉफी की तरह नुमाइश कर रहे हैं।

Migrant

बीच शहर में बसे मेरे गाँव कबिलपुर एक अलग तरह की दुनिया है। मांगलिक आ श्राद्ध के अवसर पर खाना बनाने के लिए हलवाई नहीं रखे जाते हैं ना ही कैटरर खाना खिलाता है। गाँव के लोग खुद ही यह सब कर लेते हैं और इसके लिए किसी को खास तौर पर कहना नहीं पड़ता है। अगर एक से अधिक जगहों पर जरूरत हो तो लोग खुद ही तय कर लेते हैं कि किसको किस जगह जाना है और क्या करना है। मैं जबतक गाँव में था तब तक मैं अपनी सहभागिता रखता था।

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गाँव जाता हूँ तो हाजरी बजाता हूँ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता हूँ। कभी कभी लगता है कि बीच नाटक के बीज मैं नाटक देखने के लिए पहुंच गया हूं जो कहानी को समझने की कोशिश कर रहा है। बुढ़े, बुजुर्ग मिलते हैं उनकी शिकायत होती है की सब छोड़ कर जा रहे हैं। मैं हर एक 6 महीने में गांव का चक्कर लगा लेता हूँ। कुछ नए बच्चे मिल जाते हैं प्रणाम करते हैं हाल समाचार पूछते हैं कब आए कब जाना है गांव में क्या सब हो रहा है यह बताते हैं। वह बच्चा मुझे पहचान रहा है वह जानता है कि मैं कहाँ हूँ क्या कर रहा हूं लेकिन मुझे उसका नाम तक नहीं पता। उस बच्चे को कोई आइडेंटिटी क्राइसिस नहीं है आइडेंटिटी क्राइसिस तो मुझे है की मैं उसका नाम भूल चुका हूँ। आपका गाँव आपकी मातृभूमि आपको वही प्रेम और निकटता का देती है जिसे आप शहरी जीवन के आपाधापी में भूल चुके हैं.

यह त्रिशंकु वाली स्थिति है जहां ना आप मूलवासी हैं ना ही प्रवासी।


साभार : विजय देव झा  (Principal Correspondent at The Telegraph )


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