poet nagarjuna

यहीं धुआँ मैं ढूँढ़ रहा था, यही आग मैं खोज रहा था

Literature / साहित्य, Poem / कविता
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बाबा नागार्जुन हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे । उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं । बाबा नागार्जुन बचपन से ही घुमक्कड़ प्रवृति के कारण “यात्री” हो गए। 

नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है । उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ा़व तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है ।

नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं । जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं ।  निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है । पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य कौशलों को संभव करनेवाले वे अद्वितीय कवि हैं ।

भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है । देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं । उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है । जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है । बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया । बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है ।

जब भारत में नक्सलबाड़ी का दौर चला और वो बिहार में भोजपुर में वो तेवर देखने को मिला तो उसी पर ये कविता बाबा ने लिखी । उस भोजपुर के विद्रोही तेवर को देखकर । मूलतः नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद भारत में कविता का तेवर बदला, खासकर वामपंथी कवियों में इसे लेकर एक अगल जुनून देखने को मिला, कविता छंदमुक्त हुई और एक विचारधारा को स्पष्ट रूप से दिखाए जाने लगा । आईये पढ़ते हैं नागार्जुन की कविता “भोजपुर”


1:
यहीं धुआँ मैं ढूँढ़ रहा था
यही आग मैं खोज रहा था
यही गंध थी मुझे चाहिए
बारूदी छर्रें की खुशबू!
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ…
बारूदी छर्रें की खुशबू!
भोजपुरी माटी सोंधी हैं,
इसका यह अद्भुत सोंधापन!
लहरा उठ्ठी
कदम–कदम पर, इस माटी पर
महामुक्ति की अग्नि–गंध
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ
अपना जनम सकारथ कर लूँ!
2
मुन्ना, मुझको
पटना–दिल्ली मत जाने दो
भूमिपुत्र के संग्रामी तेवर लिखने दो
पुलिस दमन का स्वाद मुझे भी तो चखने दो
मुन्ना, मुझे पास आने दो
पटना–दिल्ली मत जाने दो
3
यहाँ अहिंसा की समाधि है
यहाँ कब्र है पार्लमेंट की
भगतसिंह ने नया–नया अवतार लिया है
अरे यहीं पर
अरे यहीं पर
जन्म ले रहे
आजाद चन्द्रशेखर भैया भी
यहीं कहीं वैकुंठ शुक्ल हैं
यहीं कहीं बाधा जतीन हैं
यहां अहिंसा की समाधि है…
4
एक–एक सिर सूँघ चुका हूँ
एक–एक दिल छूकर देखा
इन सबमें तो वही आग है, ऊर्जा वो ही…
चमत्कार है इस माटी में
इस माटी का तिलक लगाओ
बुद्धू इसकी करो वंदना
यही अमृत है¸ यही चंदना
बुद्धू इसकी करो वंदना
यही तुम्हारी वाणी का कल्याण करेगी
यही मृत्तिका जन–कवि में अब प्राण भरेगी
चमत्कार है इस माटी में…
आओ, आओ, आओ, आओ!
तुम भी आओ, तुम भी आओ
देखो, जनकवि, भाग न जाओ
तुम्हें कसम है इस माटी की
इस माटी की/ इस माटी की/ इस माटी की

समीक्षक :    सत्यम कुमार झा  

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