Kshitiz Roy vicharbindu

मेरे पापा न्यूटन नहीं थे

Analysis / समीक्षा, Cinema / सिनेमा
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96-97-98 का कोई लोक सभा/ विधान सभा चुनाव रहा होगा। राज्य के तमाम शिक्षकों की तरह ही पापा चुनाव कार्य में presiding अधिकारी पाये गए थे। कुछ और याद नहीं है, लेकिन जेहन में उनके चुनाव कार्य में जाना अब भी जिंदा है! हमेशा की तरह बिजली नहीं थी; लैम्प से रोशनी छन के बचपन की उस दूसरी या तीसरी की उस किताब पर पड़ी होगी, विषय जो भी हो, उस रात दहशत ही विषय था।

हम तत्कालीन दक्षिणी बिहार और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जंगलों से घिरे हुए थे। मैं अखबार तब भी नहीं पढ़ता था, लेकिन उस रात घर में छाई चुप्पी पर  दूध डाल आंटा गूँथ रही माँ की चूड़ियों ने कुछ काला जादू जैसा कर दिया था। सैंडो गंजी में हर रात की तरह ही मुंह में पान डाले पापा मुझे पढ़ाने आए थे; हर रात वाली हंसी बस गायब पायी थी मैंने।

माँ ने बोला नहीं था; लेकिन पलामू से लेकर चतरा, चँदवा, बालूमाथ, गारु और पता नहीं कहाँ कहाँ क्रांति और व्यवस्था की मजार पर रोज ऐसे न जाने कितने मिडिल क्लास टीचर, डॉक्टर, और भतेरे सवर्ण सरकारी और गैर सरकारी आदिवासी मुलाज़िम मारे जा रहे थे। मेरे घर की आया चुपचाप मुझे सुला दे रही थी; उसकी बुआ के टोले में सादरी बोलने वाले कोमरेडों ने बहिष्कार के पर्चे उड़ाए थे। उसे और मुझे इस बात का कोई इल्म नहीं था।  हम दोनों दोस्त थे; हमें कुछ नहीं पता था, हम सपनों के इंतज़ार में सोने वाले थे।

अगली सुबह तड़के जब उठा तो जाना कि जाने वाली हर सुबह की तरह वो सुबह डरावनी थी।

पापा के इर्द गिर्द सब डरे हुए थे। मेरे पापा न्यूटन नहीं थे। वो भी डरे हुए थे।  फिर सुबह रात की सिंकी दूध के आंटे वाली दलपूड़ी लेकर वो इस ब्लू वाली बस में बैठ गए थे; जहां उनके साथ बाकी और भी अंकल राज्य सत्ता के सबसे बड़े उत्सव में अपनी कर्माहुति देने के जा रहे थे। बस की खिड़की से वो अपने परिवार वालों में और नीचे से हमें उनमें सिर्फ खालिस डर नज़र आता था; पापा जिंदा लौटेंगे – अमरूद का वो हरा पत्ता मुंह में डालते हुए मैंने सोचा था।

फिर अगली तीन रातें अद्भुत शंका, संशय और आस्था के बीच बीतीं थी। माँ हर शाम सांझा दिया दिखाने के दौरान आरती जैसा कुछ गाती थी, मैं बगल वाले कमरे में दीवार देखता उसका इंतज़ार करता था, बीच में एक बुधवार आया था जब बिजली जाने से पहले चित्रहार का इंतज़ार करते हुए मैंने और माँ ने डी डी बिहार के उस उर्दू बुलेटिन में सुना था कि हरिहरपुर विधान सभा क्षेत्र के फलां फलां बूथ पर हुए हमले में इतने लोग हताहत हो गए हैं। उर्दू वाले समाचार वाचक ने अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी में खास खास खबरें एक बार और पढ़ीं थीं, मुझे हंसने जैसा कुछ मन किया होगा लेकिन पापा हरिहरपुर के आसपास गए थे तो माँ बदहवास थी; फोन खराब था, कटोरी में दूध रोटी और कमरे में बस भरोसा था – पापा के लौट आने का!

फिर तीन दोपहरों की यातना के बाद; चौथी दोपहर पापा यूं ही आ गए थे; जैसे कि वो गए थे। बहुत दिनों के बाद इस बार शायद वो खाली हाथ आए थे; पर मैंने उन्हें माफ कर दिया था  क्यूंकि  वो आ गए थे।

माँ उनके बैग से गंदे कपड़े और खाली टिफिन निकालते हुए मुस्कुरा रही थी; चुनाव खत्म हो चुके थे।

सोन नदी के किनारे कोई बीहड़ सा गाँव था; पापा ने बाद में बताया कि नदी किनारे दस कोस पैदल चलने के बाद भूख लगने पर गाँव की किसी बूढ़ी ने उन्हें सरसों के तेल में पूरियाँ तल के खिलाईं थी, इसलिए क्यूंकी माँ के हाथ की दलपूड़ी साथ चल रहे पुलिस बल के जवानों में बंट गईं थी। दिल बड़ा हो तो भी पूरी गरीब हो सकती है, उस दोपहर पापा ने बोलते बोलते दिखा दिया था!

चुनाव के दिन दोपहर एक बजे बूथ लूटने की नाकाम कोशिश हुई थी, होते होते होते जैसे पान घुल रहा था पिता के मुख में, मुसलमानों और पासियों से भरे उस गाँव में चुनाव हो गया था। राहत की सांस जैसी कोई चीज़ होती होगी तो उन्होने ली होगी; न्यूटन की तरह संविधान और आखिरी वोटर को उसके झोपड़े से खींच कर लाने का हिरोइज़्म  नहीं था पिता में क्यूंकी  ठीक उसी वक़्त जब वो जंगल से राजपथ की ओर बढ़ रहे होंगे, वहाँ से चार किलोमीटर दूर कोई लैंड माईन फटा था जिसकी जद में आया ट्रक शुक्र से मेरे पापा का नहीं था। कोई और न्यूटन मर गया था; कोई और चुनाव हो गया था!



न्यूटन विसंगति है, आदर्श है और शायद इसलिए चरित्र है; राजकुमार राव ट्रिप पर हैं, सो इज़ मिस्टर त्रिपाठी; ये इन दोनों का अभिनय नहीं पिकनिक मनाने का दौर है!  और इसलिए न्यूटन इस साल की सबसे सुलझी फिल्म सी है जो मध्य भारत का वो सच दिखती है जो नया है, नया इसलिए कि मुल्क का कुछ ऐसा सीन है कि जो दिख गया वो नया ही है! और शायद इसलिए ये फिल्म तालियाँ नहीं चुप्पियाँ बटोरेगी! बाकी ऑस्कर वाला एंगल  बेमतलब सा पीआर सियापा है; ईमानदार कोशिशों और सिनेमाई जादू में महीन सा फर्क होता है, जिसे न्यूटन अद्भुत कोशिश के बाद भी लांघने में असफल रही है!


समीक्षक : क्षितिज रॉय

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