कैसे निखरेगी चेहरे की रंगत ?

त्वचा की देखभाल करना आसान काम नहीं है. तरह-तरह के दाग धब्बों के साथ टैनिंग आदि के कारण चेहरे की रंगत एक जैसी नहीं रह पाती. आइए जाने इस परेशनी से कैसे पाएं छुटकारा ?

खेतों की खैरियत

खेतों की खैरियत जानने मैं अनायस खेतों की तरफ बढ़ चला । दूर से हरे लहलहाते खेत वास्तविक उपज से अधिक का भ्रम पैदा कर रहे थे । मैं नजदीक पहुँचा ही था कि ३” चैौड़ी दरारों को देखकर उम्मीदें दरकने लगी । बरबस नजर उपर की ओर आकाशी गंगा को खोजने लगी । सूर्यदेव

प्रसिद्ध दार्शनिक वाल्टर बेंजामिन महोदय के प्रेरणात्मक विचार

वाल्टर बेंजामिन जर्मन के एक दार्शनिक, सांस्कृतिक आलोचक और निबंधकार थे । जर्मन आदर्शवाद, पश्चिमी मार्क्सवाद, और यहूदी रहस्यवाद के तत्वों को मिलाकर, बेंजामिन ने सौंदर्य सिद्धांत, साहित्यिक आलोचना एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद के लिए स्थायी और प्रभावशाली योगदान दिया ।

आज तक उनकी वर्दी धोयी नहीं ! जब बहुत याद आते हैं, तो पहन लेती हूं

“2009 में उसने मुझे प्रपोज़ किया था. 2011 में हमारी शादी हुई, मैं पुणे आ गयी. दो साल बाद नैना का जन्म हुआ. उसे लम्बे समय तक काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता था. हमारी बच्ची छोटी थी, इसलिए हमारे परिवारों ने कहा कि मैं बेंगलुरु आ जाऊं. मैंने फिर भी वहीं रहना चुना

जब पहली बार मेरा परिचय “पेपर लीक” शब्द से हुआ

मैं अभी कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल टायर- टू की परीक्षा से निकला ही था कि देखा कुछ परीक्षार्थी ग्रुप बनाकर मोबाइल में व्यग्रता से झांकते उसमें घुसे जा रहे थे। उनके चेहरे पर निराशाजनित आक्रमकता थी जो शनैः शनैः उनके क्रियाकलापों पर हावी होता जा रहा था।

बदरंग होता बसंत

बसंत के आगमन की पदचाप खोजते जब मैं प्रकृति की ओर उन्मुख हुआ तो कुछेक सरसों के फूल और गेंदें में मुझे बसंत सकुचाया सा मिला । फैलते कंक्रीट के जंगलों में कायदे से रखे गमलों तक पहुँचने में बसंत सहमा-सहमा ,घबराया सा लगा।

लो आज मैं कहता हूं – आई लव यू !

श्री देवी जवानी के दिनों में मेरी क्रश रही थी। अपना पूरा बचपन और किशोरावस्था मधुबाला के सपने देखते बीता था। उन सपनों पर कब श्री देवी काबिज़ हो गई, कुछ पता ही नहीं चला। उनकी फिल्म ‘हिम्मतवाला’ मैंने ग्यारह बार देखी थी। उनके स्वप्निल सौंदर्य, उनकी बड़ी-बड़ी आंखों और उनकी चंचल मासूमियत का जादू

एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं

इस आलेख में, हिंदी मैथिली के प्रखर युवा कवि विकास वत्सनाभ छात्र आन्दोलन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान और भविष्य के सामंजस्य का साधारण बोध करवाते हुए प्रतीत होते हैं । पढिये एक स्पष्ट चिंतन पर आधारित यह आलेख “एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं”

एक प्रेरक प्रसंग- “समय की क़ीमत”

यह घटना उस समय की है जब स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ चुका था । गांधी जी घूमकर या सभा बुलाकर लोगों को स्वराज और अहिंसा का संदेश देते थे । एक बार उन्हें एक सभा मे उपस्थित होने का आमंत्रण मिला ।

कम्बोडिया और अंगकोर : मेरा प्रवास

सोशलिज्म कितना खूनी हो सकता है ? पूंजीवाद कितना खूनी हो सकता है ? किसी देश के इतिहास का एक ऐसा कालखंड जब विभिन्न विचारधाराओं के एक के बाद एक इम्प्लीमेंटेशन ने  ३० लाख  (कुल आबादी का २१%) लोग मार दिए ।   कुछ आंकड़ों पर नज़र डालें।  कम्बोडिया को फ्रेंच उपनिवेशवाद से १९५३ में आजादी
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