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विभाजन काल का मुक़म्मल दस्तावेज है - "पाकिस्तान मेल" - Vichar Bindu

विभाजन काल का मुक़म्मल दस्तावेज है – “पाकिस्तान मेल”

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मैंने बहुत ज्यादा किताबें पढ़ी भी नहीं है और जो पढ़ी हैं उनमें 4-5 किताबों ने मुझे खासा प्रभावित किया है । उन्हीं 4-5 में से एक है – पाकिस्तान मेल । लेखक, पत्रकार खुशवंत सिंह की ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ का सुप्रसिद्ध लेखिका उषा महाजन ने बेहतरीन हिंदी अनुवाद किया है ।

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विभाजन के त्रासदी पर लिखी यह किताब जीवन के अनेकों रंग समेटे हुए है । इसमें प्रेम है, वासना है और बलिदान भी है । मजहबी दंगो में उलझे देश में मुश्तरका तहजीब को जिंदा रखने वाले सतलज किनारे बसे एक छोटे से गांव मनो-माजरा की कहानी है – ट्रेन टू पाकिस्तान । एक ऐसा गाँव जहां मीत सिंह जिस समय गुरुग्रंथ साहिब का पाठ कर रहे होते उसी वक़्त इमामबख्श अजान दे रहे होते थे । जहां लोगों की दिनचर्या ट्रेन की सीटियां निर्धारित करती थी । जब पूरा देश मजहबी दंगो की चपेट में था उस समय मनो-माजरा के सिख मुसलमानों की जान बचाने के लिए अपनी कुर्बानी देने के लिए तैयार थे । अचानक ऐसा बदलाव आया कि -माजरा के उसी गुरुद्वारे में मुसलमानों के कत्ल की योजना बनने लगी । और फिर उन मुसलमानों को बचाने के लिए एक सिख डाकू ने अपना जीवन कुर्बान कर दिया ।

source link Must Readप्यार में कभी कुछ भी गंदा नहीं होता

खुशवंत सिंह ने किताब में विभाजन के दर्द को समेटने के साथ अन्य चीजों को रिपोतार्ज शैली में इस तरह प्रस्तुत किया है कि पढ़ते हुए मन वेदना से भर जाता है और सारे दृश्य आंखों के सामने चलचित्र की भांति चलने लगते है । लाशों से भरे ट्रेन के डब्बे, हजारों लाशों को एक साथ जलाने वाले वीभत्स दृश्य को शब्द देना हो अथवा अपने बेटी के उम्र की लड़की को छूते हुए हुकुमचंद की मनोदशा का वर्णन हो । सभी हिस्से अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं ।

ट्रेन टू पाकिस्तान सिर्फ एक किताब नहीं है बल्कि यह विभाजन के समय का एक मुक़म्मल दस्तावेज है । यह उनकी सर्वाधिक प्रिय रचना थी क्योंकि इसी ने उन्हें लेखक के रूप में स्थापित किया और लोकप्रिय बनाया । स्वयं खुशवंत भी ऐसा ही मानते थे । उन्होंने अपनी सबसे बेहतरीन रचनाएं तब ही लिखी जब वो परेशान रहे । ट्रेन टू पाकिस्तान भी उन्होंने उस वक़्त लिखी जब वह घरेलू परेशानियों की वजह से दिल्ली से भोपाल आ गए थे । किताब को लंदन की ग्रोव प्रेस ने उस समय 1 हजार डॉलर का इनाम भी दिया था । बाद में इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ । आज जब देश में साम्प्रदायिक सौहार्द अक्सर बिगड़ते रहता है ऐसे में यह कालजयी रचना पठनीय है । खुशवंत सिंह को नमन !


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( पटना विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के छात्र हैं )


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