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व्यक्तित्व – विकास

Personality Developmentप्रिय पाठकों प्रस्तुत है, “व्यक्तित्व – विकास”  Personality Development से संबंधित स्वामी विवेकानंद जी के विचार । वर्तमान में विभिन्न संस्थानों में व्यक्तित्व-विकास से संबंधित शिक्षा का प्रसार हो रहा है ।  व्यक्तित्व-विकास के साथ ही हम एक सभ्य समाज की कल्पना कर सकते हैं । तो आईये जाने व्यक्तित्व-विकास के मुलभुत तत्व एवं तर्क ………………

व्यक्तित्व क्या है ? 

कैम्ब्रिज अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोश के अनुसार  – “आप जिस प्रकार के वक्ति हैं, वही आपका व्यक्तित्व है और वह आपके आचरण, संवेदनशीलता तथा विचारों से व्यक्त होता है ।” लांगमैन के अनुसार ‘किसी वक्ति का पूरा स्वभाव तथा चरित्र’ ही व्यक्तित्व कहलाता है ।


मित्रों, हम अपने जीवन में जो कुछ भी करते हैं,  हम उससे अनजान नहीं बन सकते, परन्तु हमने जो भी किया अच्छा या बुरा अपने ज्ञान और विवेक के आधार पर उसका मुल्यांकन कर सकते हैं । हम अपने उच्च विचारों को जितना अधिक जीवन में प्रयोग करेंगे उतना अधिक हमारा इच्छाशक्ति सबल होगा ।


अपने इच्छाशक्ति को सबल बनाना ही व्यक्तित्व-विकास का सार है । इसके कुछ महत्वपूर्ण गुण है, जिसका अनुसरण हमें करना चाहिए ।


अपने आप में विश्वास ( आत्मविश्वास ) –  स्वामी विवेकानंद अपने अन्दर के दिव्यता में विश्वास को व्यक्तित्व-विकास का मूल आधार मानते थे । उनका कहना था की इस आत्मविश्वास के बाद ही ईश्वर में विश्वास का स्थान है । यदि आपको ये विश्वास हो की आपकी आत्मा ही आपका सच्चा स्वरूप है, तो आप एक सुदृढ़ चरित्र वाला अच्छा इंसान हो सकते हैं । 


सकारात्मक विचार अपनाओ ( सकारात्मकता ) – स्वामीजी मानव  के दुर्बलता का तिरस्कार करते थे । उनका मानना था की सुदृढ़ चरित्र के निर्माण के लिए सकारात्मक विचारों की आवश्यकता है । स्वामीजी कहते हैं की

“केवल सत्कार्य करते रहो, सर्वदा पवित्र चिंतन करो; बुरे संस्कारो को रोकने का बस यही उपाय है ।……बारम्बार अभ्यास की समिष्टि को ही चरित्र कहते हैं और इस प्रकार का बारम्बार अभ्यास ही चरित्र का सुधार कर सकता है। “


असफ़लता के प्रति दृष्टीकोण  –  स्वामीजी कहते है की    “असफ़लता कभी-कभी सफलता का आधार होती हैं । यदि हम अनेक बार भी असफ़ल होते हैं । तो कोई बात नहीं । प्रयत्न करके असफल हो जाने की अपेक्षा प्रयत्न न करना अधिक अपमानजनक है ।”

 स्वामी जी का यह विचार है की अगर कोई वक्ति हजार बार भी असफ़ल  होता है, तो भी एक बार और प्रयास करना चाहिए । 


आत्मनिर्भरता  –  मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता खुद होता है । स्वामीजी कहते है –

                  “हम स्वयं ही अपनी वर्तमान अवस्था के लिए जिम्मेवार हैं और भविष्य में हम जो कुछ होना चाहें, उसकी शक्ति भी हमीं में है ।”


त्याग और सेवा  –  चरित्र के विकास के लिए स्वामीजी त्याग और सेवा को प्रमुख साधन मानते हैं । स्वामीजी कहते हैं – जितना भी भीतर से त्यागोगे, उतना ही सुख पाओगे । साथ ही स्वामी जी स्वार्थ को भी त्यागने की भी बात करते हैं । 


स्वामीजी कहते हैं – “तुम स्वयं को और प्रत्येक वक्ति को उसके सच्चे स्वरूप की शिक्षा दो और घोरतम मोह-निंद्रा में पड़ी हुई जीवात्मा को इस नींद से जगा दो । जब तुम्हारी जीवात्मा प्रबुद्ध होकर सक्रिय हो उठेगी, तब तुम्हें स्वयं ही शक्ति आयेगी, महिमा आएगी, साधुता आएगी और पवित्रता भी स्वयं ही चली आएगी – तात्पर्य यह है की जितने भी अच्छे गुण हैं, वे सभी तुम्हारे भीतर आ जायेंगे ।”


व्यक्तित्व-विकास से संबंधित यह लेख रामकृष्ण मठ प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित “व्यक्तित्व का विकास”  पुस्तक से कुछ अंश ।

VICHR BINDU

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