praveen kumar jha

नकारात्मकता : कारण और बचने के छोटे उपाय

Maatha Pachchee / माथा-पच्ची
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आगे कुछ न सूझे, मन में नकारात्मकता भरी हो, तो खुद को न खोएं, लड़ें

पाषाण काल में मनुष्य गुफाओं में जीवन बसर करता था. ऐसे में वह हिंसक जंगली जानवर और विभिन्न दैवीय आपदाओं से सशंकित रहता था. हमेशा अनिष्ट की सम्भावना रहती थी जिससे मनुष्य के मन में नकारात्मक सोच घर कर जाती थी. मनुष्य का दिमाग तथ्यों और कल्पनाशीलता के आधार पर मन में नकारात्मक सोच पैदा करता था. इस नकारात्मकता की सकारात्मक बात यह थी की मनुष्य संभावी कठिन परिस्थितियों से सदा सचेत रहता था. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं की अभाव में जीने को प्रकृति ने मनुष्य में जरुरी नकारात्मकता भर रखी थी.


वर्तमान में मनुष्य में अनुवांशिक नकारात्मक विचार आने का सबसे बड़ा कारण यही है. इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है. वैज्ञानिक शोध से भी यह बात सिद्ध हो चुकी है कि नकारात्मक विचार और भाव दिमाग को खास निर्णय लेने के लिए न केवल उकसाते हैं बल्कि ये हमारे मन पर कब्जा करके दूसरे विचारों को आने से रोक भी देते हैं. ऐसे में हम केवल खुद को बचाने पर फोकस होकर फैसला लेने लगते हैं. नकारात्मक विचार के हावी होने के कारण हम असल संकट के समय जान नहीं पाते कि असल में परिस्थितियां उतनी बुरी नहीं हैं जितनी दिख रही हैं. संकट को पहचानने या उससे बचने के लिए नकारात्मक विचार जरूरी होते हैं, जो कि हमारे जैविक विकास क्रम का ही हिस्सा है.


इस सबके उलट आज की प्रतिस्पर्धा भरी जिंदगी ने मानव के मन में असंख्य कारणों से असुरक्षा और हीन भावना घर कर दी है. ऐसे में हमें हर पल नकारात्मक बने रहने की आवश्यकता नहीं है. ऐसा करके हम सिर्फ खुद का नुकसान भर करते हैं.


आज हमारे पास रहने को सुरक्षित घर तो है किन्तु विकास ने हमें जो तनाव और थकावट दी है वो नकारात्मकता की सबसे बड़ी वजह है. तनाव के असंख्य कारण हैं आज की तारीख में. हम फेसबुक पर कम लाइक मिलने से भी तनाव में आ जाते हैं. अपना मुंह किसी हीरो-हेरोईन सा न होने पर भी तनाव में होते हैं और किसी की तरह फर्राटेदार अंग्रेजी न बोल पाने पर भी तनाव में आ जाते हैं. कई मित्रों को देखा है की बैंक में किसी और मित्र से कम बैलेंस हो तो वो तनाव में आ जाते हैं. किसी का बच्चा क्यूट नहीं है तो किसी की आवाज सुरीली नहीं. किसी का पति उसे घुमाने हिल स्टेशन नहीं ले जाता तो किसी की पत्नी मॉडर्न ड्रेस नहीं पहनती… कई लोग समंदर के किनारे का घर न मिलने से परेशान तो किसी का घर कनोट प्लेस में नहीं है तो परेशां… सबका परिणाम तनाव है.


ऐसे में मानव डिप्रेशन में चला जाता है और फिर कई मानसिक रोग से ग्रसित भी. सब कुछ होते हुए भी, दुनिया में खुद से नीचे लोगों को देखते हुए भी हम हमेशा खुद में खामी ढूंढते रहते हैं. छोटी सी बात पर खुद को अपमानित मानने लगते हैं. न कुछ होते भी हम दु:खी होने का कारण ढूंढने लगते हैं. हमारे मन को स्वाभाविक सुख से भी ज्यादा जबरदस्ती ओढ़ लिया हुआ दुःख आसान लगने लगता है.

आइये कोशिश करते हैं इस स्थिति से निबटने के कुछ आसान तरीकों की चर्चा करें. हालाँकि न तो मैं मनोवैज्ञानिक हूँ और न हीं इस विषय पर शोध किया है किन्तु थोड़े अनुभव और कुछ पढ़ाई लिखाई के आधार पर कुछ मददगार बातें बता सकता हूँ :


१. सुबह सूर्योदय से पहले उठें. पंक्षियों की चहचहाहट सुने.
२. थोडा सा वक्त योग और ईश्वर की प्रार्थना में लगायें.
४. भोजन में सादगी रखें.
५. छोटी बातों पर हंसने की आदत डालें.
६. थोडा वक़्त बच्चों के साथ बिताएं.
७. दोस्तों से संवाद करें.
८. शंका और डर वाली चीजों से भागें मत, सामना करें.
९. अख़बार व् टीवी को मनोरंजन भर के लिए देखें.
१०. खुद को यथावत स्वीकारते हुए प्रेम करें.
११. यह मानकर चलें की कोई भी पूर्ण नहीं
१२. छोटे छोटे निर्णय लेते रहें
१३. डायरी लिखें
१४. संगीत सुनें
१५. भूत और भविष्य को बिसार कर वर्तमान को जियें
१६. सकारात्मक लोगों के साथ ज्यादा समय दें

१७. अपनी गलती को भूल कर खुद के अच्छे पक्ष को याद करें.


आशा है इन तरीकों को अपना कर आप खुद के अन्दर घर की नकारात्मकता को समाप्त नहीं तो कुछ कम अवश्य कर पाएंगे. ध्यान रखें, नकारात्मकता कोई रोग नहीं… हमारा एक व्यवहार मात्र है जिसे हम बदल सकते हैं.


 

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