shardindu chaudhary

और राजनीति मुस्कुराने लगती है…

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हैंडसम वेतन, असीमित भत्ता और मात्र पांच वर्ष की सेवा के एवज में जीवन भर पेंशन । सेवा अवधि में असत्य वचन, झूठे वादे और जनता को भरमाने की खुली छूट । यदि ऐसा कोई पेशा है आज तो वह है राजनीति । ऊपर से अनियंत्रित शक्ति, कुछ भी करने की छूट – क्यों ना लोग राजनीति में आये । आज की राजनीति में लूटेरे, गुंडे, जो खुलेआम अपने कृत्यों के लिए मशहूर हैं, तो शामिल तो हैं हीं खादी में लिपटे सफेद पोश भी उतने हीं गिर गये है जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई थी । इसीलिए इस विषय पर लिखने को जी नहीं चाहता लेकिन कलम है कि मानता हीं नहीं !

पेशा में वेश्यावृति सबसे बुरी मानी जाती है लेकिन इस पेशा से जुड़ी वेश्यायें भी अपनी ग्राहकों की खुशहाली की कामना करती है ताकि उसकी झोली में गुजर-बसर करने भर धन आता रहे लेकिन आज के राजनीतिज्ञ तो अपने आश्रयदाता मतदाता को हीं चूसकर प्राचीन भारत के जमीन्दारों की याद ताजा कर रहे हैं । किसी तरह एक चुनाव जीत जाओ फिर तो सात पुश्तों की परवरिश की चिन्ता नहीं ! क्या राजनीति यही सिखलाती है !

न्यायालय ने जिसे भ्रष्टाचारी धोषित कर चुनाव लड़ने पर पाबन्दी लगा दी, वह आज अपनी पार्टी का अध्यक्ष बना सत्ता के साथ जुगलबंदी कर रहा है ; पुलिस ने जिसे अपराधी मान जेल में वर्षो तक रखा या जो निरंतर जेल आते-जाते रहते हैं, बिहार को बदलने की बात करते रहते हैं ; जो वर्ष में चार बार दल बदलकर पार्टी सिद्धान्तों, जनता से किये वादों की धज्जियां उड़ाते हैं ; वैसे लोग जो विकास की तस्वीर के आड़ में लूटी हुई राशि से सिर्फ राजधानी में करोड़ो का पोस्टर टंगवाते हैं  या विकास के नाम पर बीच शहर में दर्शनीय स्थलों को जबरन बैठाकर शहर को जाम कर रहे हैं क्या उनकी करतूतों को चुनाव आयोग सहित तमाम संवेदनशील एजेन्सियां नहीं जानती है ? जनता सब जानती है क्योंकि वही इन करतूतों का फल भुगतती है पर इन पर कारवाई करनेवाली सभी एजेन्सियां सब कुछ जानते हुए भी सुर में सुर मिलाकर कहती रहती है दिल है कि मानता नहीं !

आज पूरे भारतवर्ष में सामाजिक परिवर्तन के रूप में खासी तादाद में अन्तर्जातीय विवाह हो रहे हैं , कार्य संस्कृति बदल रही है । युवतियाँ घर से निकलकर बाहर के कामों में रूचि ले रही है लेकिन समाज को जोड़नेवाले आज के राजनीतीज्ञ जाति, समाज, सम्प्रदाय, लिंग, वर्ग आदि के नाम पर विषमता न हो कि शपथ खाकर मंत्रीमंडल के निर्माण से लेकर उम्मीदवार का चयन जाति के आधार पर करते हैं ; जातीय सभा-सम्मेलनों का आयोजन करते हैं और जातीय विद्वेष फैलाकर सत्ता सुख प्राप्त करते हैं ।चुनाव आयोग या अन्य सक्षम एजेन्सियाँ क्यों नहीं संविधान सम्मत वचन की शपथ खानेवालों की इन हरकतों का संज्ञान लेकर कारवाई करती है ! यहीं पर आकर एक प्रश्न सामने आकर खड़ा होता है और पूछता है कि क्या तुम इनकी खबर ले सकोगे ? उसके प्रतिबिम्ब बिना देर किये उत्तर देता है- राजनीति हीं ने तो तुम्हें यहाँ लाकर बिठाया है और तुम्हीं उसका जड़ खोद रहे हो ? धीरे-धीरे उसकी सेवानीति धुंधली होती जाती है और राजनीति का विस्तार स्वरूप दमकने लगता है । सामने खड़ा प्रश्न कटे वृक्ष की तरह गिर जाता है और राजनीति मुस्कुराने लगती है !


लेखक : शरदिन्दु चौधरी ( इन्द्रपुरी पटना -24 )

कुछ लेखक के संबंध में….

श्री चौधरी आर्यावर्त दैनिक में पहले फीचर संपादक फिर न्यूज एडीटर का काम कर चुके है । इन्होंने कुछ दिन मिथिला मिहिर नामक मैथिली पत्रिका का संपादन किया फिर मैथिली द्विमासिक पत्रिका समय साल का चौदह वर्षो तक संपादन करते रहे । वर्तमान में मैथिली त्रैमासिक पत्रिका पूर्वोत्तर मैथिल के संपादक तथा मैथिली के शीर्षस्थ  प्रकाशन ‘शेखर प्रकाशन’ के मालिक हैं ।


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