लघुकथा – पिता और पुत्र

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एक बूढ़ा व्यक्ति अपने पुत्र के साथ सोफे पर बैठा हुआ था । अचानक घर की खिड़की पर एक कौआ आ कर बैठ गया । पिता ने पुत्र से पूछा, ‘यह क्या है ?’ बेटे ने कहा, ‘कौआ।’ कुछ मिनट बाद पिता ने दोबारा पूछा, ‘यह क्या है ?’ बेटे ने जबाब दिया, ‘पाप मैंने अभी-अभी आपको बताया कि यह कौआ है।’ कुछ देर बाद पिता के फिर वही सवाल करने पर बेटा परेशान हो गया और रूखी आवाज में बोला, ‘क्या बक़वास है ! मैंने आपको बताया कि यह कौआ है, कौआ है, कौआ है।’ अभी कुछ मिनट ही बीते थे कि पिता ने चौथी बार पूछ लिया, ‘यह क्या है ?’ इस बार बेटे ने चिल्ला कर कहा, ‘आप क्यों बार-बार एक ही सवाल पूछ रहें हैं, जबकि मैंने आपको कई बार बता दिया कि यह कौआ है । समझ ही नहीं सकते आप ?’

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यह सुन कर बूढ़े पिता को बहुत दुःख हुआ । वह अपने कमरे में गया और एक डायरी ले कर आया । यह डायरी उसने तब लिखी थी, जब बेटे का जन्म हुआ था । उसने एक पन्ना खोलकर बेटे से उसे पढ़ने को कहा । बेटे ने पढ़ना शुरू किया – ‘आज मेरा तीन साल का बेटा मेरे साथ सोफ़े पर बैठा था, तभी एक कौआ आया । मेरे बेटे ने मुझसे 23 बार पूछा कि ‘यह क्या है ?’ मैंने हर बार प्यार से उसे गले लगाया और बताया कि यह कौआ है । मैं परेशान नहीं हुआ, बल्कि मुझे अपने मासूम बच्चे पर और प्यार आया ।’


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