बिहार के चीनी मिल, अतीत वर्तमान और भविष्य..


बिहार में सन् 1820 में चंपारण क्षेत्र के बराह स्टेट में चीनी की पहली शोधक मिल स्थापित की गई । 1903 से तिरहुत में आधुनिक चीनी मिलों का आगमन शुरू हुआ । 1914 तक चंपारण के लौरिया समेत दरभंगा जिले के लोहट और रैयाम चीनी मिलों से उत्पादन शुरू हो गया । 1918 में न्यू सीवान और 1920 में समस्तीपुर चीनी मिलों में काम शुरू हो गया ।  इस प्रकारक्षेत्र में चीनी उत्पादन की बड़ी इकाई स्थापित हो गई, लेकिन आजादी के बाद के बर्षो में सारी चीनी मिलें एक साजिस के तहत बंद कर दी गयी ।

2009 में सकरी और रैयाम को महज़ 27.36 करोड़ रुपये की बोली लगाकर लीज़ पर लेने वाली कंपनी तिरहुत इंडस्ट्री ने नई मशीन लगाने के नाम पर रैयाम चीनी मिल के सभी साजो सामान बेच दिए । सन् 2009 में 200 करोड़ के निवेश से अगले साल तक रैयाम मिल को चालू कर देने का दावा करने वाली यह कंपनी मिल की पुरानी संपत्ति को बेचने के अलावा अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं कर सकी ।

नये निवेशकों की रुचि चीनी उत्पादन में कम ही रही, वे इथेनॉल के लिए चीनी मिल लेना चाहते थे, जबकि राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं रहा । क्योंकि 28 दिसंबर 2007 से पहले गन्ने के रस से सीधे इथेनॉल बनाने की मंजूरी थी ।  उस समय बिहार में चीनी मिलों के लिए प्रयास तेज नहीं हो सका, जब प्रयास तेज हुआ तब दिसंबर 2007 में गन्ना (नियंत्रण) आदेश 1996 में संशोधन किया गया, जिसके तहत सिर्फ चीनी मिलें ही इथेनॉल बना सकती हैं । इसका सीधा असर बिहार पर पड़ा ।

 

मुश्किलें यहीं से शुरू होती है । ऐसे में बंद चीनी मिलों को चालू करा पाना एक बड़ी चुनौती आज भी है । जानकारों का कहना है कि राज्य सरकार पहले पांच साल के कार्यकाल में निवेशकों का भरोसा जीतने का प्रयास करती रही । जब निवेशकों की रुचि जगी , तब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की केंद्र सरकार ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की मांग को खारिज कर राज्य में बड़े निवेश को प्रभावित कर दिया । जो निवेशक चीनी मिलों को खरीदने के शुरुआती दौर में इच्छा प्रकट की थी वो भी धीरे-धीरे अपने प्रस्ताव वापस लेते चले गए ।

चीनी मिल प्रबंधन का कहना है कि इस समय एक किलो चीनी के निर्माण में कुल लागत 37 से 38 रुपए आती है । जबकि विदेशों से निर्यात हो रही चीनी 28 रूपए प्रति किलो देश में आ रही है और इस स्थिती में देश के किसानों के हालत की कल्पना की जा सकती है और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों का किसानों के प्रति लगाव और सोच को समझा जा सकता है ।

लेखक : अविनाश भारतद्वाज ( समाजिक एवं राजनितिक चिन्तक )

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16 Comments

  1. सोनू कश्यप
    September 17, 2016
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  2. September 17, 2016
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