डियर कार्ल मार्क्स !

जब आपके अनुयायी पिछले दस सालोँ में जे.एन.यू मे दलितोँ के उत्थान, गरीबोँ को न्याय इत्यादि पर सेमिनार आयोजित कर रहे थे, तो भारत के निम्न मध्यम वर्गीय परिवार का दो यूवक फ्लिपकार्ट बनाने में जुटे थे.

आज निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का दो बच्चा “एक लाख करोड़” में वह कम्पनी विदेशी कम्पनी को बेच दिया और इतने ही मूल्य का डालर आयात किया जिसका सरकार शायद केरोसिन तेल और डीजल सब्सिडी पर उपयोग करे. एक लाख करोड़ कितना होता है. जरा सोचिए. एक करोड़ रुपैया कितना होता है उसे ही सोच लीजिए. और यह एक लाख करोड़ सामन्तोँ से छीना नही गया है. यह एक लाख करोड़ रुपैया पैदा किया गया है. और यह इतना धन पैदा करने से कोई नाराज नही है. फ्लिपकार्ट के ग्राहक खुश हैँ, उसको कम दाम में किताबेँ मिल रही है, प्रकाशक खुश है, किताब ज्यादा बिक रहा है. 33000 लोगोँ को डायरेक्ट और लाखोँ लोगोँ को इन-डायरेक्ट रोजगार मिला है.

Karl_Marx

आपका यही तो सपना था, जन सामान्य मजबूत हो, जन सामान्य का राज्य हो. देखिए entrepreneurship वाला पूँजीवादी कनसेप्ट कैसे सफल हो गया. एक साधारण यूवक किससे सबक लेगा फ्लिपकार्ट के उद्यमी से या कन्हैया कुमार से. अतः जे.एन.यू के अपने अनुयायी को प्रेरित कीजिए, अपना दिमाग धन को पैदा करने में खर्च करेँ, धन के बँटबारे में नहीँ.


आलेख : कुमार पद्मनाभ 

 

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