मेरा गुरु कौन ?

aristotal VBCप्रिय पाठकों प्रस्तुत है, महान दार्शनिक अरस्तु महोदय से संबंधित एक प्रेरक प्रसंग मेरा गुरु कौन ? मुर्ख या विद्वान ।
एक बार एक विद्वान यूनान के दार्शनिक अरस्तु से मिलने गये ।

उन्होंने अरस्तु से पूछा, ‘में आपके गुरु से मिलना चाहता हूँ ।’ अरस्तु ने कहा, ‘आप हमारे गुरु से मिल नहीं सकते ।’ विद्वान ने कहा क्या अब वो इस दुनियां में नहीं हैं ?’ अरस्तु ने कहा ‘हमारे गुरु कभी नहीं मरते ।’ विद्वान को अरस्तु की पहेली समझ में नहीं आ रही थी । उन्होंने कहा, आपकी बात में समझ नहीं पा रहा हूँ ।’ अरस्तु ने मुस्कुराकर कहा, दुनियाँ के सभी मुर्ख हमारे गुरु हैं और दुनियाँ में मुर्ख कभी मरते नहीं ।’

विद्वान अरस्तु की बात सुनकर हतप्रभ रह गए । उन्होंने मन ही मन सोचा की अरस्तु जरुर पागल हो गए हैं । भला इतने महान व्यक्ति का गुरु कोई मुर्ख कैसे हो सकता है । फिर भी उन्होंने साहस कर के कहा, ‘लोग ज्ञान की खोज में गुरुकुल से लेकर विद्वानों और गुरुओं तक की शरण में जाते हैं । मुर्ख की शरण में जाते हुए मेनें किसी को नहीं देखा ।’

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अरस्तु ने कहा, ‘आप इसे नहीं समझोगे । दरअसल में हर समय ये मनन करता हूँ कि किसी व्यक्ति को उसके किस अवगुण के कारण मुर्ख समझा जाता है। मैं आत्मनिरीक्षण करता हूँ की कहीं यह अवगुण मेरे अंदर तो नहीं है । यदि मेरे भीतर है तो उसे दूर करने की कोशिश करता हूँ । यदि दुनियाँ में मुर्ख नहीं होते, तो में आज कुछ भी नहीं होता । अब आप ही बताईये की मेरा गुरु कौन हुआ – मुर्ख या विद्वान । विद्वान हमें क्या सिखाएगा वह खुद ही विद्वता के अहंकार से दबा होता है ।’

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