कविता ( नदी की व्यथा )


aasssi ghaat banarash

“नदी की व्यथा”

आज उससे फ़िर हुई है गुफ़्तगू
उसके ही तट पर, किनारे बैठ कर.

कह रही थी, आज तुम फिर आ गए
मैं चुप रहा ! बस आँख डबडबा गए.

पेट पतला हो गया था सुख कर
रंग काला… गंध भी विचित्र था.

कलकलाती वो न अब अविरल रही
बिनु प्रबल – प्रवाह बस स्तब्ध थी.

देख यह स्वरूप मैं… नदी से कहने लगा
न् रहेगी’ तू तो बता…कैसे बचेगी सभ्यता.

इतने में नेपथ्य’ से’ आवाज आई कान तक !
खुद ही खुद के कृत्य से मिटा रहे हो अस्मिता.

© रजनिश प्रियदर्शी / 9534350530

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