कविता – सुनो न !


GunjanShreeसुनो !
ये जो तुम्हारी बड़ी-बड़ी
बालियाँ है न,
कानों में,
मुझे इनमें तुम दिखती हो,
एकदम गोल-गोल

पता नहीं क्यूँ !

 

लेकिन इसके विपरीत
मैं चाहता हूँ की
ये गोल-गोल बालियाँ
सीधी हो जाएं रातो-रात
और पैवस्त हो जाए उन आँखों में
जिन्हें तुम, बस तुम दिखती हो !

 

 

ये बालियाँ, जब कान के रस्ते
पहुंचेंगी मस्तिक में,
और पिघलेंगी कपाल-कोटरी मध्य
शायद तब पिघलन की ज्वाला से
पिघले वह मानसिकता
की जिनमें
तुमको बस तुम समझा जाता है !

© गुँजन श्री

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