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आलेख


mother day

मातृ दिवस विशेषांक में कवि, लेखक व पूर्व आईपीएस अधिकारी “ध्रुव गुप्त” जी का आलेख  “सुख की छाया तू दुख के जंगल में !”

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image of praveen kumar jha

यूँ ही सोचते रहने की आदत है सो सोचते रहते हैं हम ! हालाँकि इस चक्कर में सर के बाल भी साथ छोड़ गए. घर परिवार वाले भी बस मजबूरीवश साथ हैं, वरना तो इस सोचते रहने की आदत की वजह से कई बार ये भी भूल जाता हूँ की मैं भाई, दोस्त, पिता, पति …

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hard-labour

देखिये मई महीने की पहली तारीख़ को मजदूर दिवस हम-आप मनाते आ रहें है और मनाएंगे भी आप मजदूर हैं की मजबूर वो तो हम नहीं जानते परन्तु ये जो हम लिख रहें हैं वो मजबूरी में लिखा गया हकीकत है ..पढियेगा तो अपच नहीं करेगा !

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mahila divash

आज अहलभोर से ही देख रहा हूँ चहुँओर महिला दिवस की बधाई वाली फेसबुकी तख़्ती लटका लिया गया है ,अधिकांश वैसे मित्रों के द्वारा भी जो व्यक्तिगत जीवन में वो नहीं चाहते या करते हैं जो वो दिखना या दिखाना चाह रहे हैं।

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