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डायरी


Image Of Shivesh Anand

डियर क्रश  डेढ़ साल तक मैं तुम्हें क्लास में देखता रहा परन्तु नाम तक नहीं पूछ सका. ऐसा नहीं है कि मैं पुराने ख़यालातों का था जिसे लड़कियों से बात करने में डर अथवा झिझक होती है. मैं फट्टू या डरपोक भी नहीं था. बात करने के तौर तरीकों में भी माहिर था.. और हूँ …

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image of praveen kumar jha

यूँ ही सोचते रहने की आदत है सो सोचते रहते हैं हम ! हालाँकि इस चक्कर में सर के बाल भी साथ छोड़ गए. घर परिवार वाले भी बस मजबूरीवश साथ हैं, वरना तो इस सोचते रहने की आदत की वजह से कई बार ये भी भूल जाता हूँ की मैं भाई, दोस्त, पिता, पति …

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aditya mohan jha

जिंदाबाद साथियों ! नववर्ष कि मंगलमय शुभकामनाओं के साथ ! मिथिला स्टूडेंट यूनियन आप सबों के स्वर्णिम भविष्य की कामना करती है । साथियों हमारे विश्वविद्यालय में व्याप्त कुव्यस्था पर विशेष प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं है । सब कुछ प्रत्यक्ष है ….प्रमाण क्या दूँ !

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writing-a-letter

ख़ुशी कैसी हो ? तेरे नाम से पहले कोई विशेषण अच्छा नहीं लगता मुझे | मुझे सिर्फ तुम ‘तुम जैसी’ ही अच्छी लगती हो | पिछले कुछ दिनों से जिस्म कि तकलीफें बढ़ गयी थी, लोग-बाग़ के साथ साथ आलमारी में लगा सीसा भी शिकायत करने लगा था |

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avinash bharadwaj

ऐसा कभी होता नहीं था. समय बदला जिम्मेवारी बदली और फिर यूँ लगा कि आसपास का पूरा संसार ही बदल गया. हर पल गुस्सा आना, मुहँ  से गाली निकलना, चिड़चिड़ापन जीवन का एक अंग बन गया. सुहाने सपने

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balcony-kea-prem-katha aanat

दिसम्बर के धुप में यूँ ही बालकनी के दूसरी तरफ मुड़ बैठ गया था | बादलों के बीच सूरज की आँख मिचौली में बालकनी की ठंडी हवा मन को मोह रही थी | एकाएक नजरें उठी और दूर के बालकनी पर जाकर अटक गई | एक खूबसूरत जवान कन्या !

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images of chhath

परेशान सा हो गई थी वो, सालों बाद छठ पर घर में सब कोई मिले थे. बातचीत करना, साथ में समय बिताना, भूले-बिसरे पल को याद करना किसे नहीं अच्छा लगता ! तो वो भी यही सब चाहती थी.

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Convince

NRB (None residential Bihari) हैं ! दिल्ली-बॉम्बे से सोच कर ये चले थे. माँ बाप का ख्याल पिछले एक महिना से दिलो दिमाग मे छाया हुआ था.

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image of rashan ka dukaan

सीना ठीक कर उस अधेर उम्र के व्यक्ति ने भड़ी बस में बोला था. सरकार राशन बँटना बंद करे. दिल तो मेरा भी मचला, दिमाग में गुस्सा को साया लहराने लगा जबाब देने को, उलझा तो था ही परंतु कुछ सोच पीछे हट गया.

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image of sukhdev

यह खत 5 अप्रेल 1929 को एसेंबली में बम फेंकने से पहले भगतसिंह द्वारा सीताराम बाजार हाउस दिल्ली में लिखा गया था. जिसे सुखदेव तक शिव वर्मा ने पहुंचाया.

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