हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते


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तश्वीर :: गूगल से साभार

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है- ऐसा कभी अरस्तु ने कहा था। कभी-कभी सोचता हूं गर संसार में रिश्ते नहीं होते तो भी क्या मनुष्य सामाजिक प्राणी होता ! या फिर समाज का निर्माण हीं संभव हो पाता ! नहीं ना ।

गौर किया जाय तो दुनिया में हम-आप कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में एक डोर में गूंथे हुए हैं। किसी ना किसी रिश्ते में । फिर चाहे वो रिश्ते जिस रूप में भी हो, जैसे भी बने हों। गंभीरता से देखें तो रिश्ते कई प्रकार के होते हैं, कई तरीकों से बनते हैं। माँ-बाप, भाई-बहन, सास-ससुर, पति-पत्नी, साली-सलहज, देवर-भाभी आदि-आदि। एक शब्द में कहें तो खून के रिश्ते। ये उस प्रकार के रिश्ते हैं जिसका निर्माण सीधे तौर पर भगवान घर से होता है। मतलब कि चुनने की आजादी का कोई सवाल हीं नहीं। इसके अतिरिक्त दूसरे जो रिश्ते हैं वह आदमी-आदमी से मिलकर बनाता है। उदाहरणार्थ मित्रता का रिश्ता। अर्थात सीधा-सीधी कहा जाय तो आप किसके साथ रिश्ता बनाएं, यह चुनने की पुरी स्वतंत्रता। गौरतलब हो कि स्वभाविक तौर पर ऐसे रिश्तों का जिम्मेदार भी आप स्वयं ही होते हैं। इनसे लोग आपके व्यक्तित्व का भी अंदाजा लगाते हैं।

यहाँ पर आगे बढ़ने से पूर्व अपने मुहल्लेवाले उपाध्याय जी का चर्चा करना चाहूंगा। जिनका देहांत इसी वर्ष वसंतपंचमी के आस-पास हुआ था। पूरे मुहल्ले में वो उपधिया जी के नाम से जाने जाते। ये अलग बात है कि उनकी गिनती अपने समय के अच्छे लेखकों में होती। वैसे अपने उपधिया जी थे बड़े व्यवहार कुशल। उनके यहाँ जो कोई भी आता, उसे बिना चाय-नाश्ता के नहीं जाने देते। भगवान ने उन्हें दिया भी था पर्याप्त सो जी भरकर अतिथि सत्कार करते। बांकी लोग बताते हैं थोड़ा-बहुत ड्रिंक्स भी लेते थे वो। वह भी नियमित तौर पर। फलस्वरूप पीने-पिलाने की मजलिस भी चलती थी उनके आवास पर। उन दिनों बिहार में शराबबंदी नहीं की गई थी। सूत्र बताते हैं कि कभी पत्नी से बनी नहीं उनकी। जिसके कारण वो, बच्चे के साथ अपने मायके में रहती थी। घर में उनके अलावा मात्र एक हमउम्र नौकर था। कुछ रामलाल-श्यामलाल टाईप नाम था उसका, जो कि फिलहाल मुझे याद नहीं। अब चूकि उपधिया जी बड़े लेखक थे इसलिए उनका समाज भी बड़ा था। अक्सर लोग उनके पास अच्छे-अच्छे भोजन-शराब और रचनात्मक सहयोग-सुझाव आदि के लिए जुटते रहते। फलस्वरूप लोगों की इस आवाजाही ने कभी परिवार की कमी ना खलने दी उनको। उन्हें स्वयं भी अपने इन रिश्तों-दोस्तों पर इतना यकीन था कि कभी पत्नी-बच्चों की ओर मुड़कर नहीं देखा। ये अलग बात है कि बुढ़ापे में बिस्तर पकड़ते हीं कोई भी उनके काम नहीं आया। वही पत्नी और बेटी बीमारी के वक्त देखभाल से लेकर अंतिम संस्कार तक का काम किया। और उनके तथाकथित मित्र-रिश्तेदार अंतिम संस्कार में भी नहीं पहुँचे। शायद इसी लिए कहा गया है- ‘हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते’ ।

यह ठीक वैसा हीं है जैसे हम में से कई लोग अपने बाँस या किसी मंत्री-अफसर आदि के लिए, उनके जन्मदिवस-वैवाहिक सालगिरह आदि मौकों पर महँगी गिफ्ट देते हैं जिन्हें पता नहीं वो खोलकर देखते भी हों या नहीं कि फल्लां ने क्या दिया है गिफ्ट में और अपने परिवारवालों/रिश्तेदारों के लिए काफी माथापच्ची के बाद कोई कामचलाऊ उपहार खरीद लाते हैं।

रिश्ते बर्फ की गोलों के तरह होते हैं, जिन्हें संभाल कर रखना काफी कठिन होता है। शायद तभी तो लिंकन कहते है कि जो व्यक्ति जितने मजबूत रिश्ते बना कर रखता है, वो उतना हीं मजबूत इंसान है। जबकि देखा यह गया है कि लोग आनन-फानन में किसी से रिश्ता जोड़ तो लेते हैं परन्तु कुछ समय पश्चात उन रिश्तों में वो गर्माहट नहीं रहती, जिसकी नितांत आवश्यकता होती है। अक्सर इन्हीं सब कारणों से मैं रिश्ते बनाने से कतराता रहता हूं। फिर आजकल रिश्ते निस्वार्थ भाव से बनाए भी तो नहीं जाते। हर किसी से रिश्ता बनाने के पीछे लोगों का कुछ ना कुछ निजी स्वार्थ रहता है। बहुत कम ऐसा देखा गया है कि स्वार्थवश बने रिश्ते भविष्य में और ज्यादा मजबूत होते हैं। फलस्वरूप रिश्तों में वो चीज नहीं रहती जो मूलतः होनी चाहिए थी।

यहाँ सोशल मीडिया और इंटरनेट ने भी आपसी रिश्तों खासकर खून के रिश्तों की गर्माहट कम करने में ठीक-ठीक आग में घी डालने जैसा कार्य किया है। आज देखा यह गया है कि लोग वर्चुअल स्पेस पर हजारों अनजान लोगों से रिश्ता जोड़ने के लिए ललायित रहते हैं, जबकि एक हीं घर में, एक हीं छत के नीचे रह रहे दो लोग एक दूजे से ऐसे ट्रीटमेन्ट करते हैं जैसे दोनों दो मुल्क के वाशिंदे हों।

गौरतलब हो कि अधिक रिश्तेदार या बड़े परिवार वाले लोगों का अधिकतर समय व्यवहारिक बनने में हीं गुजर जाता है। अधिक रिश्ते और रिश्तेदार तो कई जगह लोगों के कैरियर में बाधा बनते भी देखे गए हैं। आज लोग हर अच्छे-बुरे वक्त में एक-दूसरों से कम्प्लीमेन्ट की उम्मीदें पाले रहते हैं। औपचारिक संदेशो जैसे बधाई, अफसोस, धन्यवाद आदि की उम्मीदें रखते हैं। फिर नहीं तो ऐसे अनऔपचारिक लोगों से कटते चले जाते हैं। ये बहुत हीं अफसोसजनक सोच है। कायदे से होना यह चाहिए कि वो प्यार, वो स्नेह आपके मन में रहे जिससे रिश्तों में अपनापन बना रहे। यहाँ पर बताता चलूं कि स्वयं मैं बड़े परिवार में पला-बढ़ा हूं। कितना-कितना वक्त बीत जाता है हमें एक-दूसरों से मिले, बात किए बिना। वावजूद हम आज भी जब कभी किसी त्योहार, परिवारिक उत्सव आदि पर एक साथ जुटते हैं, ऐसा फील होता है जैसे मानों एक-दूजे के लिए हीं बने हुए हों। इसलिए ज्यादा औपचारिक/व्यवहारिक होने से ज्यादा बेहतर हैं कि रिश्ते दिल से निभाए जाएं। अच्छे-बुरे वक्त में एक दूजे का संग निभाया जाय। ना कि रिश्तों का मजाक बनाया जाय। हमें एक-दूसरों कि आजादी का ख्याल करते हुए, रिश्तों में गर्माहट बनाए रखते हुए एक-दूसरों के पर्सनल लाइफ के लिए स्पेस बनानी चाहिए। इति।


लेखक : बालमुकुन्द

बालमुकुन्द हिन्दी और मैथिली में लिखते हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित-प्रसंशित हैं। आप मैथिली वेब पत्रिका www.emithila.in के संस्थापक-सम्पादक है। इनसे  mukund787@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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