सेक्स की समस्या और समाधान


सेक्स की इतनी अधिक समस्याएं मनुष्य की मूढ़ता के कारण पैदा हुई हैं । बहुत ही सुगमता से इसमें प्रवेश कर इसका आनंद उठाया जा सकता है और इसके बाद इसे रूपांतरित कर उच्चतर आनंद की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है ।
      ओशो ने मनुष्य के जीवन में हर सात साल के बाद एक परिवर्तन पाया है । उसके शारीरिक-मानसिक परिवर्तन के अनुरूप ही शिक्षा-व्यवस्था होनी चाहिए । अगर ऐसा हो तो मनुष्य हर अवस्था के सुखों को भोगते हुए पचास वर्ष तक पहुंचते हुए बुद्धत्व को भी उपलब्ध हो सकता है ।
      मनुष्य का प्रथम सात वर्ष अत्यंत निर्दोष सरलता, सहजता पावनता और खेल का होता है । ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जिससे उसके स्वाभाविक गुण निखरते चले जायं, जबकि होता इसके विपरीत ही है । अगले सात वर्षों तक उसके अंदर सेक्स के बीज अंकुरित होने लगते हैं और चौदहवें वर्ष में वे प्रत्यक्ष दिखायी पड़ने लगते हैं । 14 से लेकर 21 तक निरंतर विकसित होती हुई सेक्स- शक्ति उफान पर पहुंच जाती है । इसके बाद अगले सात साल तक वह और मजबूती को प्राप्त करती है । इसके अगले सात वर्ष स्थिर रहती है । उसके बाद ढलान शुरू होती है ।
      21 वें साल के आसपास जब सेक्स- शक्ति चरम पर होती है, उसी समय युवक-युवतियों के मिलन की व्यवस्था होनी चाहिए ।
       सेक्स जब मन को पागल बनाने लगता है तो आप यह नहीं कह सकते कि ध्यान करो, भजन-कीर्तन करो, सृजन में लग जाओ, पढ़ाई पर चित्त लगाओ । नहीं, यह गलत होगा । इस तरह की बातें अमनोवैज्ञानिक और मूढ़तापूर्ण हैं ।  यह ऐसी अवस्था है, जहाँ पहुंचने पर नारद जैसे ज्ञानी और भक्त भी कह उठते हैं —

          जप तप कछु न होइ तेहि काला ।
          हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला ।।

“इस समय जप-तप  कुछ नहीं हो सकता । हे विधाता ! किसी तरह वह कन्या मुझे मिले !”
      नारद जी की इस काम-पीड़ा को दर्शाने वाले मर्यादावादी कवि तुलसीदास जी हैं । कहा जाता है कि भगवान बुद्ध के पास ध्यान के लिए किसी भूखे को लाया गया तो भगवान ने यही कहा कि पहले इसे भरपेट खाना खिलाओ । यह कहावत तो प्रसिद्ध ही है कि ” भूखे भजन न होहिं गोपाला” ! वह भूख चाहे पेट की हो या सेक्स की, पहले उसकी पूर्ति होनी चाहिए । उसके बाद उसे रूपांतरित करने की बात सोची जानी चाहिए ।
      ऐसा नहीं होने का परिणाम है कि ऊपर-ऊपर हमारा समाज कुछ ओर है तथा भीतर कुछ और । हमारे समाज का भीतरी सच यह है — हस्तमैथुन, समलैंगिकता, बाल यौनाचार, परिवार के अंदर यौनाचार, यौन व्यापार, छेड़खानी, बलात्कार इत्यादि । सेक्स के उद्दाम वेग पर नैतिकता, मर्यादा, संस्कृति आदि के नाम पर रोक लगाने का उपर्युक्त परिणाम हमारे सामने । इसलिए सुधीजनों को शांतिपूर्वक विचार कर सेक्स को सहज सुलभ कराया जाना चाहिए ।
      इसके बाद सेक्स के ऊपर का सुख पाने का प्रयत्न होना चाहिए । इस दृष्टि से भी हमारा समाज बांझ है । सेक्स का अभाव बनाये रखने के कारण चित्त उसी पर जीवन पर्यंत लगा रहता है । उससे ऊबने का अवसर ही नहीं मिलता और बुढ़ापे तक लालसा बनी रहती है । लेकिन शक्ति क्षीण होने के कारण संताप पैदा होता है और बुढ़ापा डरावना हो जाता है, जबकि वह शांतिपूर्ण और आनंदपूर्ण हो सकता है ।
      यौन-सुख को उच्चतर सुख में रूपांतरित करने के तीन उपाय हैं — ध्यान, सृजन और प्रेम ।
      ध्यान एक चमत्कारी औषधि है । व्यक्ति-भेद के कारण इसके द्वारा जीवन में अनेक रूपांतरण घटित होते हैं । मैं अपने अनुभव की चर्चा यहाँ करूंगा ।
      मेरी सेक्स-समस्या का समाधान ओशो की शरण में जाने से हुआ । इसके पहले जितने लोगों तक मैं पहुंच सकता था, पहुंचा । किसी के पास समाधान नहीं था । न किसी विद्वान के पास, न किसी साहित्यकार के पास और न महर्षि मेंहीं के पास ।
     मैंने पहली बार ओशो की पुस्तक “ध्यानयोग : प्रथम और अंतिम मुक्ति” का पारायण किया और उसमें वर्णित सक्रिय ध्यान का प्रयोग किया । वह मेरे जीवन में क्रांतिकारी साबित हुआ । प्रथम चरण के कुछ ही मिनटों में पूरे शरीर में बिजली दौड़ गयी ! लगा कि इस करेंट से मेरी जान जा सकती है । और डर के मारे मैंने सांसों की तेज और गहरी गति को शिथिल कर दिया । इसके बाद आनंद की लहर उमड़ी । यह सब देख मैं चकित विस्मित था । इतनी छोटी-सी क्रिया और इतना बड़ा आनंद ! आश्चर्य तो यह कि यह यूनिवर्सिटी के किसी प्रोफेसर को नहीं मालूम ! निराला की कविता याद आयी —
 
          पास ही रे हीरे की खान
          खोजता फिरता कहाँ नादान ?

मैं कहाँ भटक रहा था ! कबीर जैसा अनुभव हुआ —

     पीछे लागा जाइ था, लोक बेद के साथ
     आगैं थैं सद्गुरु मिल्या दीपक दिया हाथ

कबीर कहते हैं कि अन्य लोगों की तरह मैं भी लोक के पीछे और शास्त्र के पीछे भटक रहा था। गुरु आगे से आकर मिले और कहा, लो यह दीपक । इसकी रोशनी में चलो ।
        तब से मैं सद्गुरु के द्वारा दिये गये ध्यान रूपी दीपक की रोशनी में ही चलता हूँ । अभी उसकी रोशनी क्षीण है । आगे तेज होगी । और भी सधे कदम उठेंगे ।
       आरंभ में देखा कि ध्यान करने से काम-भावना और प्रदीप्त हो उठी । कामरस और ज्यादा आनंददायी हो गया । स्त्रियों का सौंदर्य बढ़ गया । प्रकृति निखरी-निखरी लगने लगी ।
       धीरे-धीरे मालूम हुआ कि यह जीवन तो सांसों का खेल है ।सांस लेने के ढंग में परिवर्तन करने से जीवन में परिवर्तन आ जाता है । अशांत जीवन को सांस में परिवर्तन लाकर शांत किया जा सकता है । गरमी में शीतलता लायी जा सकती है और ठंडी में गरमी पैदा की जा सकती है । एक ढंग की सांस जीवन ऊर्जा को ऊपर उठाती है, जबकि दूसरे ढंग की सांस नीचै गिराती है । सांसों को नियंत्रित कर संभोग अवधि मनोवांछित समय तक बढ़ायी जा सकती है और पूर्ण तृप्ति पायी जा सकती है । यह तृप्ति उससे मुक्ति में सहायक बन जाती है ।
        आती-जाती सांसों का निरीक्षण हमें निर्विचार अवस्था में लेकर चला जाता है । वहीं समाधि फलित हो सकती है । कहते हैं, भगवान बुद्ध यही प्रक्रिया अपनाकर बुद्ध हो गये थे ! ध्यान से ही भौतिक ज्ञान प्राप्त होता है, ध्यान से ही आत्मिक ज्ञान प्राप्त होता है ।ध्यान को शिक्षा का अनिवार्य विषय बनाया जाना चाहिए ।
      ध्यान से हम शून्यानंद प्राप्त करते हैं । इसे पाने पर सेक्सानंद फीका हो जाता है । जिसे मानसरोवर का जल सुलभ हो वह गड्ढे का जल पीने किसलिए जायेगा ?
       सेक्स पर विजय पाने का दूसरा महत्वपूर्ण मार्ग है सृजनशीलता । इसका अर्थ यह नहीं है कि कविता-कहानी लिखी और सृजनशील हो गये ! सृजनशीलता का अर्थ है कर्मलीनता । किसी भी काम में लीन होना सृजनशील होना । लीनता में हमारे अहं का विलयन हो जाता है । अहं के खोते ही आनंद उमड़ता है और कर्म में कुशलता आ जाती है । स्वभावतः हमारी ऊर्जा उसी ओर प्रवृत्त हो जाती है । जिस ऊर्जा से हम सेक्स की तरफ दौड़ते हैं, वह सृजन में लग जाती है और हमारी कामेच्छा विलीन होने लगती है ।
      सेक्स से ऊपर उठाने में प्रेम महती भूमिका अदा करता है ।  लेकिन उचित पात्र का प्रेम पाने की आशा में बैठा नहीं रहना चाहिए । जो भी मिले उसपर प्रेम लुटाने की क्षमता आ जाय तो जीवन में क्रांति आ जाती है । शर्त इतनी है कि प्रेम लुटाने में प्रतिदान की आशा नहीं रहनी चाहिए । ऐसा हो जाय तो प्रेम ब्याज सहित लौटता है । सौ गुना होकर लौटता है । प्रेमानंद बड़ा रस है । इसमें छके व्यक्ति को सेक्स की सुधि कहाँ रहती है ? वह अपने आप संतुलित हो जाता है ।
       इस तरह सेक्स की समस्याओं से बचने के लिए जो उपाय बताए गये हैं, प्रयोग कर देखना चाहिए कि इसमें सचाई है या नहीं ?


आलेख : मटुकनाथ चौधरी

( सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष हिंदी, पटना विश्वविद्यालय )

 

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