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समाज


unscientific-work

कुछ प्रथाएं ऐसी हैं जो धर्म या परंपरा के नाम पर हज़ारो सालों से ज़ारी हैं, लेकिन जो वस्तुतः घोर अधार्मिक और अवैज्ञानिक हैं। बंद जलाशयों या तालाबों में मछलियों को आटा खिलाना उनमें सर्वाधिक प्रचलित प्रथा है। किसी भी धार्मिक स्थल पर तालाबों में ऐसा करते सैकड़ों लोग आपको मिल जाएंगे।

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rajanish-priyadarshi

सामाजिक सरोकार से जुड़े हुए प्रशिक्षित योग्य व्यक्ति अगर मुख्यधारा में नहीं आए तो फिर राजनीति जैसे पवित्र शब्द को लोग गाली समझते रहेंगे । और हमने मिथिला के सैकड़ों युवाओं को प्रशिक्षित किया है वो परिपक्व हो रहें है ।

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“आंधियों में भी दीये जलाने” की क्षमता उनमें थी

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी …

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salni jha

एक नन्हीं सी जान जो इतनी नाजुक होती है, जैसे ओस की बूंदे इतनी खूबसूरत जैसे सर्दी की धूप । ईश्वर की वह रचना जिससे इस सृष्टि का सृजन होता है, वह बेटी होती है, पत्नी होती है, बहन होती है, मां होती है, और दोस्त भी । फिर उस बेटी, बहन, मां और दोस्त …

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Are-we-really-free

प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त हम भारतीयों के लिए विशेष दिन होता है। तीन राष्ट्रीय त्योहारों में से एक स्वतंत्रता दिवस हमें जश्न मनाने का सुअवसर प्रदान करता है। हरेक वर्ष हम इस दिन गुलामी,संघर्ष,आंदोलन,शहीदों और आजादी को याद करते हैं। इन तमाम उत्सवों और हर्षोल्लासों के बीच एक प्रश्न बार-बार हमारे जेहन में उठता है- …

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Kosi-Mithila-and-Governments vicharbindu

सन 2008 में जब कोशी कोसी में बाढ़ की वजह से मिथिला का एक बहुत बड़ा हिस्सा तबाह हुआ था उस समय मैंने कोशी पर एक ब्लॉग लिखा था कि कैसे स्वतंत्रता

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Indian Police

विचार बिंदु  के इस अंक में प्रस्तुत है, हमारे पुलिस महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजहों और निदान के रास्तों की पड़ताल करता कवि, लेखक व पूर्व आईपीएस अधिकारी   “ध्रुव गुप्त” जी का आलेख ‘पुलिसिया पंचतंत्र – भेड़िये और जनता की कहानी’ ।

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जय मिथिला-जय मैथिली के युग्म से पैदा हुआ एक आंदोलन आजकल हॉट केक बना हुआ है। दरभंगा से दिल्ली तक हर वीकेंड पर इसकी पारम्परिक आहट आप महसूस कर सकते हैं। इसकी डिटेल रिपोर्टिंग और रणनीति फेसबुक पर 24/7 देख सकते हैं । कुछ बहुत सक्रीय संगठनों का दावा है कि बस अब क्रान्ति का …

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sonu-nigam

हम सब पूरे खलिहर हैं । एक बार और ये बात साबित कर दिये । पता नहीं क्यों हम एक सड़क छाप मुद्दे को राष्ट्रीय विपत्ति बनाने पर तूल जाते हैं । फेसबूक पे दो खेमा है…

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आज़ादी हमने जीने के लिए ली है, मरने के लिए नहीं ,हमारे जवानों को भी आजादी चाहिए इन

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