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आलेख


image of radicals

चलिए हमलोग  प्राथमिक कणों के खूबसूरत और कौतूहलपूर्ण संसार की सैर करते हैं. प्राथमिक या मूलभूत कण अर्थात जो अन्य कणों से मिलकर नहीं बने हों.

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parpose day

आज ‘प्रोपोज डे’ की धूम देखकर अपनी नाकाम जवानी पर अफ़सोस हुआ. हमारी पीढ़ी में अपने सपनों की मलिका के सामने प्रेम का प्रस्ताव रखने का साह्स कम ही होता था.

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atal-bihari-vajpayee

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का एम्स में निधन हो गया । पूरे देश में शोक की लहर फैल गयी। लोग अपने-अपने तरीके से उन्हें याद कर रहे हैं। वाजपेयी जी को याद करने के कई कारण हैं। देश उन्हें केवल एक प्रधानमंत्री के रूप में ही नहीं बल्कि एक पत्रकार, कवि, ओजस्वी वक्ता, राजनीति …

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juvenile crime 2

वैसे तो हिंसा हमारी प्रवृति में शामिल हो गयी है और ये एक वैश्विक समस्या के रूप में उभर रहा है । चाहे रेयन इंटरनेशनल स्कूल में 16 वर्ष के बच्चे की हत्या हो या हरियाणा में 18 वर्ष के बच्चे द्वारा स्कूल प्रिंसिपल की हत्या या फिर सहरसा में लगातार हो रही हिंसा, युवाओं …

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Is love being a stranger to a fantasy

किसी अजनबी से प्रेम का हो जाना, इसकी पुष्टि करने के लिए अभी तक कोई संस्था ब्रह्माण्ड में नहीं है और न इसकी डिग्री नापने के लिए किसी भी तरह के यूनिट व् किसी प्रकार के बैरोमीटर का आविष्कार अभी तक नहीं हो पाया है फिर भी व्यक्ति अपने विवेक का उपयोग करके इस बेहद …

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sailing-boat- vicharbindu

पोखर से पूरबारी बाध की तरफ जाने के लिए मैंने फोरी में नाव को डाल दिया जिसकी चौड़ाई तकरीबन तीस फीट थी। दोनों तरफ खरही लगे हुए थे जिस का कुछ भाग पानी में तो कुछ भाग पानी से ऊपर था।

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Shalini Jha

पटना विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर शालिनी झा अपनी माँ को पत्र लिखती हैं, जिसमें  मध्यमवर्गीय परिवार की औसत लडकियाँ प्रेषक की भूमिका में प्रतीत हो रहीं हैं । “संजीदा“ पति चाहिए “खरीदा“ हुआ नहीं ।

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sailing-boat

मैं नाव के अगले माईन पर बैठा था और मेरी नजरें जलकुंभी के फूलों पर टिकी थी जो धीरे-धीरे मेरे पास आती जा रही थी । करमी के फूलों की पृष्ठभूमि में उसकी खूबसूरती और बढ़ गई थी।

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भारत का वो हिस्सा जो कभी ज्यादा लाइम-लाइट में नहीं रहा था । एक ऐसा जगह जिसे न पूरा भारत जानता था और न कभी अखबारों में सुर्खियों बनकर आया । वो जगह है कारगिल ।

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mother day

मातृ दिवस विशेषांक में कवि, लेखक व पूर्व आईपीएस अधिकारी “ध्रुव गुप्त” जी का आलेख  “सुख की छाया तू दुख के जंगल में !”

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