देवी सरस्वती की विशेष पूजा अर्चना कैसे करें – मन्त्र, चालीसा एवं विधि


Saraswati

वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है । मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं । हर साल माघ महीने में शुक्ल की पंचमी को विद्या और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की उपासना होती है । इस पर्व को आम भाषा में वसंत पंचमी कहा जाता है । पढिये देवी सरस्वती की विशेष पूजा अर्चना कैसे करें, मन्त्र एवं विधि ।

Saraswati

सबसे पहले अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्घ करें- “ॐ अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा । य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि: ॥” इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगायें फिर आचमन करें – ॐ केशवाय नम: ॐ माधवाय नम:, ॐ नारायणाय नम:, फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें- ॐ पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता । त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥

शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाना चाहिए । अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें “चन्‍दनस्‍य महत्‍पुण्‍यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्‍यम् लक्ष्‍मी तिष्‍ठतु सर्वदा ।” बिना संकल्प के की गयी पूजा सफल नहीं होती है इसलिए संकल्प करें । हाथ में तिल, फूल, अक्षत मिठाई और फल लेकर “यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः भगवत्या: सरस्वत्या: पूजनमहं करिष्ये” इस मंत्र को बोलते हुए हाथ में रखी हुई सामग्री मां सरस्वती के सामने रख दें ।

इसके बाद गणपति जी की पूजा करें । गणपति पूजन हाथ में फूल लेकर गणपति का ध्यान करें । मंत्र पढ़ें- गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम् । उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् । हाथ में अक्षत लेकर गणपति का आवाहन: करें “ॐ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ ।। इतना कहकर पात्र में अक्षत छोड़ें । अर्घा में जल लेकर बोलें – एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ॐ गं गणपतये नम: । रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ॐ गं गणपतये नम:, इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं । इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नम: । दुर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं । गणेश जी को वस्त्र पहनाएं । इदं पीत वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि । पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें: इदं नानाविधि नैवेद्यानि “ॐ गं गणपतये समर्पयामि: । मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र “इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ॐ गं गणपतये समर्पयामि: । प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें । इदं आचमनयं ॐ गं गणपतये नम: । इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ गं गणपतये समर्पयामि: । अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: “एष: पुष्पान्जलि ॐ गं गणपतये नम:”

इसी प्रकार से नवग्रहों की पूजा करें । गणेश के स्थान पर नवग्रह का नाम लें । कलश पूजन घड़े या लोटे पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें । कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें । कलश के गले में मोली लपेटें । नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें । हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरूण देवता का कलश में आह्वान करें । “ॐ त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि: । अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी: ।” (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ । स्थापयामि पूजयामि ॥) इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी प्रकार वरूण और इन्द्र देवता की पूजा करें । सरस्वती पूजन सबसे पहले माता सरस्वती का ध्यान करें


“या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता । या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता । सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।1।।

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं । वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यांधकारपहाम्।।
हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् । वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।2।।

शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥2॥


इसके बाद सरस्वती देवी की प्रतिष्ठा करें । हाथ में अक्षत लेकर बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः महासरस्वती, इहागच्छ इह तिष्ठ । इस मंत्र को बोलकर अक्षत छोड़ें । इसके बाद जल लेकर ‘एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ।” प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं: “ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः ।। ॐ श्री सरस्वतयै नमः ।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं । इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं । “ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः । पूजयामि शिवे, भक्तया, सरस्वतयै नमो नमः ।। ॐ सरस्वतयै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि । “इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं । अब सरस्वती देवी को इदं पीत वस्त्र समर्पयामि कहकर पीला वस्त्र पहनाएं । नैवैद्य अर्पण पूजन के पश्चात देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें । मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” बालें । प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें । इदं आचमनयं ऊं सरस्वतयै नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि । अब एक फूल लेकर सरस्वती देवी पर चढ़ाएं और बोलें: “एष: पुष्पान्जलि ऊं सरस्वतयै नम:। इसके बाद एक फूल लेकर उसमें चंदन और अक्षत लगाकर किताब कॉपी पर रख दें ।

पूजन के पश्चात् सरस्वती माता के नाम से हवन करें । इसके लिए भूमि को स्वच्छ करके एक हवन कुण्ड बनाएं । आम की अग्नि प्रज्वलित करें । हवन में सर्वप्रथम ‘ॐ गं गणपतये नम:’ स्वाहा मंत्र से गणेश जी एवं ‘ॐ नवग्रह नमः’ स्वाहा मंत्र से नवग्रह का हवन करें, तत्पश्चात् सरस्वती माता के मंत्र ‘ॐ सरस्वतयै नमः स्वहा’ से 108 बार हवन करें । हवन का भभूत माथे पर लगाएं । श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण करें इसके बाद सभी में वितरित करें ।

माता सरस्वती के 108 नाम व मंत्र

1  सरस्वती ॐ सरस्वत्यै नमः।

2  महाभद्रा ॐ महाभद्रायै नमः।

3  महामाया ॐ महमायायै नमः।

4  वरप्रदा ॐ वरप्रदायै नमः।

5  श्रीप्रदा ॐ श्रीप्रदायै नमः।

6  पद्मनिलया ॐ पद्मनिलयायै नमः।

7  पद्माक्षी ॐ पद्मा क्ष्रैय नमः।

8  पद्मवक्त्रगा ॐ पद्मवक्त्रायै नमः।

9  शिवानुजा ॐ शिवानुजायै नमः।

10  पुस्तकधृत ॐ पुस्त कध्रते नमः।

11  ज्ञानमुद्रा ॐ ज्ञानमुद्रायै नमः।

12  रमा ॐ रमायै नमः।

13  परा ॐ परायै नमः।

14  कामरूपा ॐ कामरूपायै नमः।

15  महाविद्या ॐ महाविद्यायै नमः।

16  महापातक नाशिनी ॐ महापातक नाशिन्यै नमः।

17  महाश्रया ॐ महाश्रयायै नमः।

18  मालिनी ॐ मालिन्यै नमः।

19  महाभोगा ॐ महाभोगायै नमः।

20  महाभुजा ॐ महाभुजायै नमः।

21  महाभागा ॐ महाभागायै नमः।

22  महोत्साहा ॐ महोत्साहायै नमः।

23  दिव्याङ्गा ॐ दिव्याङ्गायै नमः।

24  सुरवन्दिता ॐ सुरवन्दितायै नमः।

25  महाकाली ॐ महाकाल्यै नमः।

26  महापाशा ॐ महापाशायै नमः।

27  महाकारा ॐ महाकारायै नमः।

28  महाङ्कुशा ॐ महाङ्कुशायै नमः।

29  सीता ॐ सीतायै नमः।

30  विमला ॐ विमलायै नमः।

31  विश्वा ॐ विश्वायै नमः।

32  विद्युन्माला ॐ विद्युन्मालायै नमः।

33  वैष्णवी ॐ वैष्णव्यै नमः।

34  चन्द्रिका ॐ चन्द्रिकायै नमः।

35  चन्द्रवदना ॐ चन्द्रवदनायै नमः।

36  चन्द्रलेखाविभूषिता ॐ चन्द्रलेखाविभूषितायै नमः।

37  सावित्री ॐ सावित्र्यै नमः।

38  सुरसा ॐ सुरसायै नमः।

39  देवी ॐ देव्यै नमः।

40  दिव्यालङ्कारभूषिता ॐ दिव्यालङ्कारभूषितायै नमः।

41  वाग्देवी ॐ वाग्देव्यै नमः।

42  वसुधा ॐ वसुधायै नमः।

43  तीव्रा ॐ तीव्रायै नमः।

44  महाभद्रा ॐ महाभद्रायै नमः।

45  महाबला ॐ महाबलायै नमः।

46  भोगदा ॐ भोगदायै नमः।

47  भारती ॐ भारत्यै नमः।

48  भामा ॐ भामायै नमः।

49  गोविन्दा ॐ गोविन्दायै नमः।

50  गोमती ॐ गोमत्यै नमः।

51  शिवा ॐ शिवायै नमः।

52  जटिला ॐ जटिलायै नमः।

53  विन्ध्यवासा ॐ विन्ध्यावासायै नमः।

54  विन्ध्याचलविराजिता ॐ विन्ध्याचलविराजितायै नमः।

55  चण्डिका ॐ चण्डिकायै नमः।

56  वैष्णवी ॐ वैष्णव्यै नमः।

57  ब्राह्मी ॐ ब्राह्मयै नमः।

58  ब्रह्मज्ञानैकसाधना ॐ ब्रह्मज्ञानैकसाधनायै नमः।

59  सौदामिनी ॐ सौदामिन्यै नमः।

60  सुधामूर्ति ॐ सुधामूर्त्यै नमः।

61  सुभद्रा ॐ सुभद्रायै नमः।

62  सुरपूजिता ॐ सुरपूजितायै नमः।

63  सुवासिनी ॐ सुवासिन्यै नमः।

64  सुनासा ॐ सुनासायै नमः।

65  विनिद्रा ॐ विनिद्रायै नमः।

66  पद्मलोचना ॐ पद्मलोचनायै नमः।

67  विद्यारूपा ॐ विद्यारूपायै नमः।

68  विशालाक्षी ॐ विशालाक्ष्यै नमः।

69  ब्रह्मजाया ॐ ब्रह्मजायायै नमः।

70  महाफला ॐ महाफलायै नमः।

71  त्रयीमूर्ती ॐ त्रयीमूर्त्यै नमः।

72  त्रिकालज्ञा ॐ त्रिकालज्ञायै नमः।

73  त्रिगुणा ॐ त्रिगुणायै नमः।

74  शास्त्ररूपिणी ॐ शास्त्ररूपिण्यै नमः।

75  शुम्भासुरप्रमथिनी ॐ शुम्भासुरप्रमथिन्यै नमः।

76  शुभदा ॐ शुभदायै नमः।

77  सर्वात्मिका ॐ स्वरात्मिकायै नमः।

78  रक्तबीजनिहन्त्री ॐ रक्तबीजनिहन्त्र्यै नमः।

79  चामुण्डा ॐ चामुण्डायै नमः।

80  अम्बिका ॐ अम्बिकायै नमः।

81  मुण्डकायप्रहरणा ॐ मुण्डकायप्रहरणायै नमः।

82  धूम्रलोचनमर्दना ॐ धूम्रलोचनमर्दनायै नमः।

83  सर्वदेवस्तुता ॐ सर्वदेवस्तुतायै नमः।

84  सौम्या ॐ सौम्यायै नमः।

85  सुरासुर नमस्कृता ॐ सुरासुर नमस्कृतायै नमः।

86  कालरात्री ॐ कालरात्र्यै नमः।

87  कलाधारा ॐ कलाधारायै नमः।

88  रूपसौभाग्यदायिनी ॐ रूपसौभाग्यदायिन्यै नमः।

89  वाग्देवी ॐ वाग्देव्यै नमः।

90  वरारोहा ॐ वरारोहायै नमः।

91  वाराही ॐ वाराह्यै नमः।

92  वारिजासना ॐ वारिजासनायै नमः।

93  चित्राम्बरा ॐ चित्राम्बरायै नमः।

94  चित्रगन्धा ॐ चित्रगन्धायै नमः।

95  चित्रमाल्यविभूषिता ॐ चित्रमाल्यविभूषितायै नमः।

96  कान्ता ॐ कान्तायै नमः।

97  कामप्रदा ॐ कामप्रदायै नमः।

98  वन्द्या ॐ वन्द्यायै नमः।

99  विद्याधरसुपूजिता ॐ विद्याधरसुपूजितायै नमः।

100  श्वेतासना ॐ श्वेतासनायै नमः।

101  नीलभुजा ॐ नीलभुजायै नमः।

102  चतुर्वर्गफलप्रदा ॐ चतुर्वर्गफलप्रदायै नमः।

103  चतुरानन साम्राज्या ॐ चतुरानन साम्राज्यायै नमः।

104  रक्तमध्या ॐ रक्तमध्यायै नमः।

105  निरञ्जना ॐ निरञ्जनायै नमः।

106  हंसासना ॐ हंसासनायै नमः।

107  नीलजङ्घा ॐ नीलजङ्घायै नमः।

108  ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका ॐ ब्रह्मविष्णुशिवान्मिकायै नमः।


सरस्वती नमस्तुभ्यं वर्दे कामरूपिणी
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु में सदा ।

हे सबकी कामना पूर्ण करने वाली माता सरस्वती, आपको नमस्कार करता हूँ ।
मैं अपनी विद्या ग्रहण करना आरम्भ कर रहा हूँ , मुझे इस कार्य में सिद्धि मिले ।


॥ देवी सरस्वती चालीसा॥

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी॥1

रूप चतुर्भुज धारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
जग में पाप बुद्धि जब होती।तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥2

तब ही मातु का निज अवतारी।पाप हीन करती महतारी॥
वाल्मीकिजी थे हत्यारा।तव प्रसाद जानै संसारा॥3

रामचरित जो रचे बनाई।आदि कवि की पदवी पाई॥
कालिदास जो भये विख्याता।तेरी कृपा दृष्टि से माता॥4

तुलसी सूर आदि विद्वाना।भये और जो ज्ञानी नाना॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा।केव कृपा आपकी अम्बा॥5

करहु कृपा सोइ मातु भवानी।दुखित दीन निज दासहि जानी॥
पुत्र करहिं अपराध बहूता।तेहि न धरई चित माता॥6

राखु लाज जननि अब मेरी।विनय करउं भांति बहु तेरी॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा।कृपा करउ जय जय जगदंबा॥7

मधुकैटभ जो अति बलवाना।बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥
समर हजार पाँच में घोरा।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥8

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥9

चंड मुण्ड जो थे विख्याता।क्षण महु संहारे उन माता॥
रक्त बीज से समरथ पापी।सुरमुनि हदय धरा सब काँपी॥10

काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा।बारबार बिन वउं जगदंबा॥
जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा।क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥11

भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई।रामचन्द्र बनवास कराई॥
एहिविधि रावण वध तू कीन्हा।सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥12

को समरथ तव यश गुन गाना।निगम अनादि अनंत बखाना॥
विष्णु रुद्र जस कहिन मारी।जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥13

रक्त दन्तिका और शताक्षी।नाम अपार है दानव भक्षी॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥14

दुर्ग आदि हरनी तू माता।कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
नृप कोपित को मारन चाहे।कानन में घेरे मृग नाहे॥15

सागर मध्य पोत के भंजे।अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में।हो दरिद्र अथवा संकट में॥16

नाम जपे मंगल सब होई।संशय इसमें करई न कोई॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई।सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥17

करै पाठ नित यह चालीसा।होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।संकट रहित अवश्य हो जावै॥18

भक्ति मातु की करैं हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥
बंदी पाठ करें सत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥19

रामसागर बाँधि हेतु भवानी।कीजै कृपा दास निज जानी।20

॥दोहा॥

मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप।
डूबन से रक्षा करहु परूँ न मैं भव कूप॥
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।
राम सागर अधम को आश्रय तू ही देदातु॥


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