काबर झील पक्षी अभयारण्य


Kanwar Lake Bird Sanctuary

क्षेत्र है बेगूसराय के मंझौल अनुमंडल में अवस्थित काबर झील का जो एशिया के सबसे बड़े मीठे पानी के झील में से एक माना जाता है.कहते हैं यह ६४ वर्गकिलोमीटर में फैला था किन्तु अब इसका क्षेत्रफल सिमटकर ४२ वर्ग किलोमीटर रह गया है.  काबर झील घरेलू और प्रवासी पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों का आश्रय है, या यूँ कहिये की था, क्योंकि मानवीय उपेक्षाओं ने इसे बहुत हद तक बर्बाद किया है! साइबेरिया और हिमालय क्षेत्र से पक्षी यहां सर्दियों के मौसम में देख सकते हैं.

Kanwar Lake Bird Sanctuary

पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली यहाँ वर्षो शोध किये और यह साबित किया था की यहां साइबेरिया से पक्षी प्रवास पर आते हैं. उन्होंने सरकार से इस क्षेत्र को पक्षी अभ्यारण्य के रूप में विकसित करने का वादा भी लिया था किन्तु वर्षों बीत जाने के बाद भी यह स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों के आँख का सपना ही रह गया! यहाँ यह बता दें की इस झील का क्षेत्रफल और संभावना भरतपुर पक्षी अभयारण्य से कहीं ज्यादा है.

( According to Wikipedia ; The Kanwar Taal or Kabar Taal Lake located in Begusarai district of Bihar, India, is Asia‘s largest freshwater oxbow lake. It is approximately three times the size of the Bharatpur Sanctuary. )

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कंवर झील पक्षी अभयारण्य का विडियो देखें 

काबर झील, पक्षी के अलावा मीठे पानी के मछलीयों का भी प्रमुख स्रोत है और इसमें मछलियों की अनेकानेक प्रजाति पायी जाती है जो इस क्षेत्र के लोगो में अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध है. इस प्रकार यह स्थानीय मल्लाह और मुशहर लोगों के रोजगार का भी साधन रहा है. हाल में इसके पानी के धीरे-धीरे सूखने के कारण इसके उपजाऊ भूमि में किसान खेती करने के लालच को रोक नहीं पा रहे हैं, किन्तु मुझे निजी तौर पर लगता है की किसानो को अपने लालच पर काबू रखना चाहिए और इस प्राकृतिक जल क्षेत्र के तारतम्यता बरकरार रखने में अपना योगदान देना चाहिए.

Kanwar Lake Bird Sanctuary

यह प्राकृतिक रूप से जल-क्षेत्र है और इस पर नैसर्गिक अधिकार इस पर आश्रित जीव-जंतु, पेड़-पौधे और मल्लाहों का ही होना चाहिए. सरकार को भी चाहिए की सक्रियता दिखाते हुये भूमि विवाद को निबटाये और किसानो को उनकी भूमि का उचित मुआवजा देने के साथ रोजगार के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराये. साथ ही आसपास के क्षेत्र में खेती में कीटनाशक के प्रयोग को भी वर्जित करें जिससे लुप्त होते जा रहे पक्षियों का संरक्षण हो सके. यदि विगत २०-२५ सालों में स्थानीय आबादी और प्रशासन इसको लेकर उदासीन न हुआ होता तो आज यह क्षेत्र प्रसिद्ध पक्षी अभ्यारण्य के रूप में विकसित हो चुका होता, पर अफसोस… !


आलेख फोटो एवं विडियो सौजन्य ; प्रणव झा 


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