एक कवि जो रमता जोगी, निठट्ठ गंवार और स्थानीय येट ग्लोबल थे


Baba Nagarjun vicharbindu

एक कवि जो रमता जोगी थे । निठट्ठ गंवार, स्थानीय येट ग्लोबल थे । हर जगह घुमें, घाट-घाट पहुंचे, सबसे मिले-सबसे जुड़े लेकिन फिर भी अपना निजी गुण नहीं छोड़ा । सच बोलने की आदत नहीं गई, सरकार सिस्टम ने जब भी अनाचार अपनाया बाबा खुलकर विरोध किए ।

पहले नेहरू-गांधी विचारधारा का समर्थन किए फिर बाद में नेहरू जी के मनमरजीयों के खिलाफ उनके विरोधी भी हो गए । इंदिरा का पहले समर्थन किया फिर इमरजेंसी के वक्त खुलकर विरोध में आए । जयप्रकाश जी और जनसंघ का समर्थन किया फिर बाद में इनसे भी नाउम्मीद हुए । कभी उन्होंने वामपंथ का भी समर्थन किया फिर उससे भी अलग हो गए । अजीब थे वो, किसी को पकड़ के नहीं बैठे । एक अजीब आशावादी इंसान थे, जहाँ हल्की सी उम्मीद दिखती थी बदलाव की वो उसके साथ खड़े हो जाते थे । बाबा कहते थे की जो भी ग़रीब और उसके भोजन-कपड़े की बात करेगा, मैं उसके साथ हूँ ।

Baba Nagarjun vicharbindu

बाबा मैथिली में ‘यात्री’ के नाम से लिखे और हिंदी में ‘नागार्जुन’ पर असली नाम ‘वैद्यनाथ मिश्र’ था, जन्म सतलखा मधुबनी और अपना गांव तरौनी, दरभंगा । इनकी कविताएं विद्रोही तेवर और तंज-आलोचना का एक माध्यम बनी राजनीति को आइना दिखाती हुई । इन्होंने नेहरू के ख़िलाफ़ लिखा “आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी…” जब ब्रिटश महारानी का स्वागत करने का निर्णय नेहरू जी ने लिया था । नेहरू और तत्कालीन राजनीति को उन्होंने कई और कविताओं में होलियाया, ऐसे ही इंदिरा के खिलाफ भी इन्होंने खुले तौर पर नाम लेकर लिखा, इमरजेंसी के वक्त ये 11 महीना जेल भी रहे । शुरुआती वक्त में शिक्षक भी रहे और पत्रकार भी, आजादी से पहले इन्होंने कई किसान-मजदूरों का मास मूवमेंट भी चलाया था, उसमे भी कई बार जेल गए थे । वस्तुतः नागार्जुन एक जनवादी कवि थे, पाक चरित्र-जिद्दी स्वभाव-मारक लेखन ।

लेकिन एक कवि को अक्खड़ होने की कीमत भी चुकानी पड़ती है । इतने बड़े छवि के बावजूद जीवन गरीबी और अभाव में बिताना पड़ता है । साहित्य अकादमी पुरस्कार और साहित्य लेखकों के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार साहित्य अकादमी फेलोशिप मिलने के बावजूद उन्हें कभी कोई पद्म पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वो हमेशा हर सरकार के ख़िलाफ़ लिखते रहे । अजीब लगा की कैसे इतने बड़े लेखक, आन्दोलनी, विचारक और पब्लिक फिगर को कभी किसी सरकार ने पद्म पुरस्कार के योग्य नहीं समझा । फिर सोचे की बाबा उसके लिए थोड़े न कर रहे थे, नागरिक अवचेतन में वो आज भी हैं और हमेशा रहेंगे ।


आलेख : आदित्य झा 

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