पीपल की आत्मकथा


प्रिय पाठकों विचार-बिंदु के इस अंक में प्रस्तुत है । विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेषांक युवा साहित्यकार सुमित मिश्र ‘गुंजन’ द्वारा रचित लघुकथा “पीपल की आत्मकथा” 

पीपल की आत्मकथा उस वक्त मैं बहुत छोटा था जब एक बच्चे ने मुझे खंडहर से लाकर गांव के मंदिर के पास मुझे लगाया था। मैं गांव के रंग में रंग गया था। लोग मुझे पानी देते और मेरी सुरक्षा का ख्याल रखते थे। कहते हैं ना कि खुशी के समय जल्दी बीतते हैं, लोगों के अपनेपन और गांव की आबोहवा में मुझे पता ही नहीं चला कि कब में युवा हो गया। मेरी शाखों की संख्या निरंतर बढ़ रही थी और मैं गांव में विशिष्ट बन चुका था। वो बच्चा जिसने मुझे यहां लगाया था, उसकी बूढी आंखें मुझे देख कर ना जाने क्यों खुश हो जाती ? उसका संतुष्ट चेहरा बहुत कुछ बयाँ करता था।

खैर… पीढ़ियाँ बदलने लगी और मेरी महत्ता भी । गांव के लोग मुझे पूजने लगे थे। शायद उन्हें मुझ में अपने पुरखों का अक्स दिखता होगा या फिर भगवान का। मेरी ठंडी छाया पूरे गांव की संजीवनी थी। सुबह से शाम तक मेरी छत्र-छाया में कितने ही लोग आते, गपशप करते, आराम फरमाते, ताश खेलते। कालांतर में मेरे नीचे पंचायत लगने लगी थी। मैंने कई बार न्याय के सम्मुख अन्याय को दम तोड़ते देखा है।

उधर किसानों के पसीने की बूंद से खेत लहलहा उठते थे। पूबारी बाध और मझिला बाध से लेकर बड़का बाध तक की सारी धरती फसलों से श्रृंगार करती थी। मुझे याद है जब बसंती जवान होती,आँमों में बौर आता और महुआ महकने लगती। ठीक तभी फगुआ के धुन में सारे लोग झूम उठते। वे प्रकृति से,अपनी माटी से,खेतों से,पुरखों से,संस्कृति से,सब से प्रेम करते थे।

अंतोगत्वा समय बीतता गया और अब मैं बूढ़ा हो चुका हूं।सारी स्मृतियां पीछे छूट चुकी हैं। अब सामने निर्मम वर्तमान पड़ा है। वह वर्तमान जहाँ कल झा जी कह रहे थे,”व्हाट नॉनसेंस,गांव में तो गधे बसते हैं,कभी आओ दिल्ली, हमारे डेरा पर, शहर घुमाता हूं।”
लोग पलायन कर रहे हैं। गांव में बमुश्किल कुछ बूढ़े चिराग बचे हैं। किसी को किसी की फिक्र नहीं। सभ्यता,संस्कृति और अपनी माटी जाए तेल लेने, उन्हें तो बस गांव की बेड़ियां तोड़ शहर में मजदूरी करनी है।

लोगों के चले जाने से खेत पथार, बाध, गाछी, गांव सब विधवा की तरह दिख रहे हैं। मैं कितनी बार चिल्लाकर पूछता हूं शहर जाने वाले राहगीरों से,”तुम आखिर क्यों जा रहे हो? क्या पुरखों का धरोहर कोई मायने नहीं रखता?क्या तुम्हारी माटी अब उर्वर नहीं रही, जो तेरा पेट पाल सके?” परंतु व्यर्थ,कोई भी मेरी आवाज नहीं सुन पा रहा।
बहरहाल थक-हारकर बसंती ने इस गाँव में आना छोड़ दिया। अब महुआ नहीं महकता है। कोयल ने मौन-वर्त ले रखा है। आँमों में बौर आना बंद हो गया है। अब सब जगह सन्नाटा पसरा है। मेरी बूढ़ी आंखें इन्हें देख निर्झर हो चली हैं।मेरी आत्मा रो रही है। मैं अब इस वर्तमान को नहीं देखना चाहता और मजबूरी है कि अतीत को देख नहीं सकता…

लेखक : सुमित मिश्र ‘गुंजन’ ( करियन,समस्तीपुर )

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