ख़ुशी – तेरे नाम एक खुला ख़त


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ख़ुशी कैसी हो ? तेरे नाम से पहले कोई विशेषण अच्छा नहीं लगता मुझे | मुझे सिर्फ तुम ‘तुम जैसी’ ही अच्छी लगती हो | पिछले कुछ दिनों से जिस्म कि तकलीफें बढ़ गयी थी, लोग-बाग़ के साथ साथ आलमारी में लगा सीसा भी शिकायत करने लगा था |

दिल कि तकलीफों को तो कोई नहीं देखता ख़ुशी पर जिस्मानी तकलीफें सब को नज़र में चुभने लगती है | अब तो हद ये है कि सीसे में भी ये नहीं दीखता, माँ-बाबूजी के बाद शायद तुम ही एक थी जिसको सबकुछ साफ़-साफ़ दीख जाता था, मुझे ‘आज’ पता होता तो ‘कल’ तुम्हें जाने नहीं देता, हरगिज नहीं जाने देता, तुम नहीं मानती तो तांत्रिक बाबा से तुम्हें सीसा बनवाकर आलमारी में लगा देता |

जानती हो डॉक्टर साहब ने ढेर सारी दवाईयां भिजवा दी है | तुझे तो पता ही है कि मुझे दवाईयों से कितनी नफरत है, और जो काम मुझे पसंद नहीं वो भूल जाने की पुरानी आदत है | तब तुम थी तो याद दिलाती रहती थी अब कौन है यहाँ जो याद दिलायेगा | बाबूजी डांटकर बोले थे कि दवा टाइम से खा लेने, वो मेरे ज्यादा परेशान थे मेरी बिमारी को लेकर | उनके लिए मैंने मोबाइल में अलार्म लगा दिया एक बार सुबह के 10 बजे का और फिर रात का 10 बजे का | अलार्म कि बात मान लेने के लिए तेरी जुबान में एक संवाद डाल दिया – “दवा खा लो बाबू” | पर जानती हो अब जब भी अलार्म के साथ मोबाइल के स्क्रीन पर “दवा खा लो बाबू” उभरता है, कसम से शब्द दिखाई नहीं देता, कानों में सिर्फ तेरी आवाज़ गूंजती है- ‘दवा खा लो बाबू’ |

ये कैसा कनेक्शन है मेरा-तेरा ख़ुशी?? मेरी कितनी चीजों में तुम समा गयी हो? इसी को प्यार कहते हैं क्या? मुझे तो ये नशा लगता है | मुझे शायद किसी नशा मुक्ति पुनर्वास केंद्र जाने की जरुरत है | तुम्हें कोई पता हो तो सूचित करना |
नाउम्मीदी पर जबाब की प्रतीक्षा…
किसका गौरव ??

लेखक : अविनाश कुमार  ( Beparwah.in )

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