लिंग विभेद / Gender Sensitization


Gender Sensitization vicharbindu

महिलाओं को सबसे अधिक शोषित महिला ही करती है । खेत बेच के बेटा को IIT की तैयारी के लिए भेज दो ! और बेटी “बी.ए.ड” कर ले तो बहुत है । एक बहु के लिए उसका ससुर सबसे अच्छा इंसान होता है लेकिन सास दुनियाँ की सबसे बेकार औरत आखिर क्यों ? ये हजारों वर्ष पूर्व प्रेक्टिस में लाया जा चुका है जिसे खत्म होने में न जाने कितना वर्ष और लग सकता है । हमारे समाज के अनुसार एक लड़की प्रत्येक माह असुद्ध होती है लेकिन वो एक सामान्य बायोलॉजीकल प्रॉसेस है । घर – परिवार, समाज, रीति-रिवाज एवं परम्परा सभी स्तर पे “लिंग विभेद” कायम है ।

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कर्म क्षेत्र के अलावा कई और सामाजिक क्षेत्र में भी ये विभेद दिखता है। आदमी को ज्यादा सुविधा दी जाती है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार, “पितृसत्तात्मकता सामाजिक संरचना की ऐसी प्रक्रिया और व्यवस्था हैं, जिसमें आदमी औरत पर अपना प्रभुत्व जमाता हैं, उसका दमन करता हैं और उसका शोषण करता हैं।” महिलाओं का शोषण भारतीय समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक घटना है। पितृसत्तात्मकता व्यवस्था ने अपनी वैधता और स्वीकृति हमारे धार्मिक विश्वासों, चाहे वो हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से ही क्यों न हों, से प्राप्त की हैं।

प्राचीन भारतीय हिन्दू कानून के निर्माता मनु के अनुसार, “ऐसा माना जाता हैं कि औरत को अपने बाल्यकाल में पिता के अधीन, शादी के बाद पति के अधीन और अपनी वृद्धावस्था या विधवा होने के बाद अपने पुत्र के अधीन रहना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में उसे खुद को स्वतंत्र रहने की अनुमति नहीं हैं।”

मुस्लिमों में भी समान स्थिति हैं और वहाँ भी भेदभाव या परतंत्रता के लिए मंजूरी धार्मिक ग्रंथों और इस्लामी परंपराओं द्वारा प्रदान किया जाता है । तीन तालाक इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ।

वैश्विक परिदृश्य पर अगर नजर डालें तो एक प्रसङ्ग है की पाकिस्तान ने अपने गर्ल्स टीम को जापान फुटबॉल प्रतियोगिता में इसलिए नहीं जाने दिया क्योंकि जिवाउल हक ने शर्त रखा की खेल में दर्शक सिर्फ स्त्री होनी चाहिए ।

अगर हम ये सोचते हैं की स्त्रियाँ कमज़ोर होती है या उसे सदैव पुरुषों के चिंतन के अनुकूल ही चलना चाहिए तो हमें डार्विन साहब की पंक्ति याद करनी चाहिए की “सबसे शाक्तिशाली जीव तेलचटा होता है” अर्थात जो जीव विपरीत स्थिति में कितना सस्टण्ड करता है । और एक बच्चे को जन्म देते वक्त 32 हड्डी के टूटने इतना तकलीफ में होती है एक औरत ! फिर कमज़ोर कौन ? आने वाले समय में और पुरुषों और महिलाओं के सामूहिक प्रयासों से लिंग असमानता की समस्या का समाधान हमें ढूँढना चाहिए और प्रयोग में लाना चाहिए ।


रजनीश प्रियदर्शी  के इस आलेख पर विभिन्न लोगों ने अपना तर्क प्रस्तुत किया !

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रुचि स्मृति : इन सब के मूल के एक हीं बात है , लड़की भावुक होकर सोचती है , अगर वो अपनी भावना तथा वर्तमान परिस्थिती के बीच साम्य कर ले तो वो ना तो कभी खुद को किसी भी प्रकार से कमजोर अनुभव करेगी और ना हीं किसी और के द्वारा ऐसा करने देगीं ।


Prabhakar Jha Vikash : मुझे लगता है कि मनु स्मृति पर आजकल जितनी बातें हो रही है उतनी कभी नहीं हुई। ये ठीक है कि मनु का ग्रंथ स्त्री स्वतंत्रता का विरोध करता है परंतु उसका व्यापक प्रभाव किसी भी काल में स्त्री सशक्तिकरण पर नहीं हुआ । प्राचीन भारत में आपको ऐसी बहुत सी विरांगना एवं पण्डिता सहज ही मिल जाएँगी जो मनु के कुत्सित सिद्धांत को मुँह चिढाती हैं। जो मनुस्मृति हमारी ज्ञान परंपरा में कभी महत्वपुर्ण ही नहीं रही उसके चक्कर मे ‘यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते’ की महान सनातनी परंपरा को स्त्रीविरोधी बतानें का विरोध करता हूँ। हिन्दू समाज में पाई जानें वाली स्त्रीविरोधी सारी संकल्पनाएँ मध्य काल की अव्यवस्थित राजनीतिक स्थिती का परिणाम है।

आज जिस तरह से बाजार के हर उत्पाद को स्त्रीदेह के आकर्षण में बाँध कर बेचनें का प्रयास हो रहा है वो भी तो चिन्तनीय है। स्त्रीवाद की मनमानी व्याख्या और विमर्श नें भी स्त्रियों को कम नुकसान नहीं पहुँचाया है। बहुधा स्त्रीवाद के नाम पर स्त्रियों के मन में पुरुषों से शत्रुता के बीज रोपे जाते हैं जिससे समान्यतः अराजकता ही फैलती है।
बहुत से अतिवादी फेमनिज्म के झंडाबरदार पुरुषसत्ता के बरक्स स्त्रीसत्ता को खङा करनें का प्रयास कर रहीं हैं। इसे ही मैं स्त्रियों का पुरुष हो जाना कह रहा हूँ।

मैं बस इन तीन बिन्दूओं पर अपनी बात कहना चाहता था जो शायद जल्दी-जल्दी में कह नहीं पाया।
बाद-बाँकी समानता,न्याय और मानव समाज के अन्य उदात्त मुल्यों का कौन भला विरोध कर सकता है?

धन्यवाद !


Deepak Mishra : यह एक हद तक सच है। बल्कि, ऐसा कहना अतिशय न होगा कि ‘स्त्री प्रकृति की सर्वोत्तम कृति है, उनमें प्रकृति और मनुष्य का सामंजस्य है, कारणवश वह अधिक संवेदनशील है।’ देखिए, संवेदनशील होना खतरनाक नहीं है, हाँ सावधानी इस बात की तो ज़रूर ही होनी चाहिए कि प्रेम महज़ मनुष्यत्व से किया जाए, मनुष्य से नहीं। जब हम मनुष्यत्व के बजाए मनुष्य से प्रेम करने लगते हैं, तब हम उसके पाशविकता को भी स्वीकृति देने लगते हैं। आज की स्त्री को कवि ही बने रहना है, भावुक ही बने रहना है, पर उन्हें ईवर-आर्मस्ट्रॉन्ग-इलियट और विलियम-वर्ड्सवर्थ जैसा ‘कवि आलोचक’ होना है ।

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अच्छा आलेख है, लेकिन आकलन चार दशक पुराना सा है। ‘महिलाओं को सबसे अधिक शोषित महिला ही करती है’ इस अवधारणा के मूल में ‘साँप भी मरे और लाठी भी न टूटे’ जैसा ही साजिश है। दरअसल, किशोरी को महिला बनने तक पितृवाद के ऐसे यंत्र से गुजारा जाता है, जिसमें उसकी इयत्ता जल जाती है। स्त्री होने तक उसमें उसका ‘अपना’ कुछ नहीं रह जाता है, वह ‘मनमोहन सिंह’ हो जाती है- ‘चेहरा मेरा, काम तेरा।’ दूसरी बात यह कि आज की स्त्री इतनी लाचार, बेबस, निरीह नहीं रह गई हैं कि हम और आप उनकी चिंता करे। दरअसल, इस चिंता के मूल में ‘श्रेष्ठता’ और ‘संरक्षक’ का वही मिलाजुला भाव रहता है, जिसने स्त्री-जाति को ‘चूल्हा’ ‘आटा-चक्की’ और ‘सेक्स-टॉय’ बना दिया। आज की स्त्री ‘अपनी चिंता स्वयं करेंगी’। अब वे किसी चिंतक के मोहताज नहीं रही ।


निवेदनलिंग विभेद / Gender Sensitization के विषय पर आपका विचार आमंत्रित हैं ! आप आपना तर्क निश्चित रूप से व्यक्त करें ! प्रस्तुती अच्छा लगा हो तो कृपया लिंक आवश्य शेयर करें, जिससे एक स्वस्थ संवाद स्थापित किया जा सके ! धन्यवाद | जय हिन्द 

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