संत कबीरदास के दोहें


kabir das प्रिय पाठकों प्रस्तुत है, मानव जीवन के वास्तविकताओं से पूर्ण संत कबीरदास जी के दोहे और उसका अनुवाद । हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखने वाले कबीरदास जी मानव जीवन के रहस्यों को आसानी से दोहे के माध्यम से समझा देते है । आगे ….

शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान  । तिन लोक की सम्पदा, रही शील में आन   ।१।

अर्थात्  – संत कबीर कहते हैं, की  शील, यानि सद्गुण ही संसार की सारी सम्पदा के समान है  । ईमानदारी, सच्चाई, कर्तव्य पालन, दया, करुना जैसे सद्गुणों में ही वास्तविक वैभव व सम्मान है  ।

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह  । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह   ।२। 

अर्थात्  –  संत कबीर कहते हैं, की इच्छाएँ, लालसाएं ही सब चिंताओं की जड़ हैं  । जिसे कोई लालसा नहीं वही वास्तविक सम्राट है  ।

कबीरा गरब न कीजिये, कबहू न हंसिये कोय  । अबहूँ नाव समुद्र में, का जाने का होय  ।३।

अर्थात्  – संत कबीर कहते हैं, न कभी अहंकार कीजिये और न किसी का उपहास कीजिए, क्योंकि जीवन में अगले ही पल क्या हो जाए, कोई नहीं जानता  । यानि परिस्थितियाँ कभी भी पलट सकती हैं  ।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप  । अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप  ।४।

अर्थात्  – संत कबीर कहते हैं, की किसी की बात की अति न करें । जैसे बहूत बरसात अच्छी नहीं होती, न ही बहूत धूप, उसी तरह न ज्यदा बोलना अच्छा है, न मौन बने रहना  । 

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय  ।५।

अर्थात  –  संत कबीर कहते हैं, की दूसरों में बुराई को खोजने से अच्छा है , अपने अन्दर के बुराई को पहचानना । क्योंकि अगर संसार के सभी वक्ति अपनी-अपनी  बुराई को पहचान कर उसमे सुधार करें तो संसार से बुराई ही खत्म हो जाए ।

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय । औरन को शीतल करै, आपोंहू शीतल होय  ।६।

अर्थात्  – संत कबीर कहते हैं की आपने क्रोध और अंहकार को त्याग कर, मधुरता से बोलिए जिससे लोगों को सुख मिलेगा और लोग आप से भी मधुरता बनाये रखेंगे । 

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ।७।

अर्थात्  –  संत कबीर कहते हैं , की जो वक्ति आपकी निंदा करता है उसे अपने पास रखिये क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के आपको आपके स्वभाव को साफ़ करता है, आपको अपने आप के आकलन का अवसर देता है ।

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ।८।

अर्थात्  – संत कबीर कहते हैं, की प्रभु मुझे इतना ही दीजिये जिसमे मेरा जीवन-यापन चल जाए । कोई साधु-महात्मा, मेहमान मेरे दरवाजे से भूखा न जाय ।

 धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । माली सींचे सौ घड़ा, ऋतू आए फल होय ।९।

अर्थात्   – संत कबीर कहते हैं, की मनुष्य को हमेशा धेर्य से काम लेना चाहिए, क्योंकि अगर माली पेड़ में सौ घड़ा पानी भी सींचे तो भी ऋतू आने पर ही फल लगेगा ।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।  पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब  ।१०।

अर्थात्   – संत कबीर समय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, जो तुम्हें कल करना है उसे आज करो, जो आज करना है वो अभी करो, समय बीत जाने पर पछताने के सिवाय कुछ प्राप्त नहीं होगा  ।

कबीरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी ख़ैर  । ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर  ।११।

अर्थात्   – संत कबीर इस संसार में अपने जीवन में यही चाहते थे कि सबका भला हो , और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो  ।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ।१२।

अर्थात्   –  संत कबीर गुरु की महिमा की बखान करते हुए कहते हैं, की गुरु और गोविन्द दोनों एकसाथ खड़े है पहले किन्हें वंदन करू , कबीर गुरु को पहला स्थान देते हुए कहते हैं की आपकी ही कृपा से गोविन्द के दर्शन हुए ।

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय । कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ।१३।

अर्थात्   – संत कबीर कहते हैं , की कभी भी किसी छोटे वस्तु या किसी भी प्राणी को तुक्छ नहीं समझना चाहिए । क्योंकि एक तिनका जो धरती पर पड़ा है आपको कोई कस्ट नहीं पंहुचता लेकिन वही तिनका अगर आपके आंख में पर जाये तो बड़ा ही कस्ट देता है । क्या पता कब कौन क्या हो जाये ।

दोस पराये देख करि  , चला हसन्त हसन्त । अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ।१४।

अर्थात्   – संत कबीर कहते हैं, की यह मनुष्य का स्वभाव है की जब वह दूसरों के दोष को देख कर हँसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न अदि है न अंत ।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।१५।

अर्थात्   – संत कबीर कहते हैं, की  किसी भी व्यक्ति की जाति से उसके ज्ञान को नहीं जाना जा सकता , किसी सज्जन की सज्नता का अनुमान भी उसकी जाति से नहीं लगाया जा सकता इसलिए किसी से उसकी जाति पूछना व्यर्थ है । उसका ज्ञान और व्यवहार ही उसका परिचय है । जैसे किसी तलवार का अपना महत्व है पर म्यान का कोई महत्व नहीं । वो सिर्फ़ उसका उपरी आवरण है ।


 

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