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Analysis / समीक्षा


image of Praveen Kumar jha

“यूँ तो हमारे ऊपर सोशल मीडिया का दबाव इस क़दर तक बढ़ चला है कि हम ख़ुद का हीं स्वाभाविक चाल चरित भूल गए हैं, किंतु हालात सोचनीय इस बात को लेकर है की इस होड़ में कई बार हम ख़ुद तक को धोखा देने लगते हैं”

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ruchi smriti

अवसाद बीमारी है ! बहुत भयंकर वाली । जिसका इलाज समय से ना होने पर लोग जीते जी जिन्दा लाश की तरह होते हैं । आत्महत्या करने का जी करता है ! आज कल के समय में यह किसे और कब हो जाए कुछ पता नहीं । सामाजिक रूप से मान-मर्दन, शारीरिक रूप से बिमार, …

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Karl_Marx

जब आपके अनुयायी पिछले दस सालोँ में जे.एन.यू मे दलितोँ के उत्थान, गरीबोँ को न्याय इत्यादि पर सेमिनार आयोजित कर रहे थे, तो भारत के निम्न मध्यम वर्गीय परिवार का दो यूवक फ्लिपकार्ट बनाने में जुटे थे.

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Bad journalism

जमीन बदल गई तो मायने बदल गए। मायने बदले तो चेहरा बदल गया,रहन-सहन और जीवन की शर्तें बदल गईं। वैश्विक अर्थशास्त्र की इस बाढ़ के चलते खासा बदलाव आ गया है समाज में। तो फिर कैसा पत्रकार और कैसा दिवस।

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fear-of-rape

अगर कोई शख़्स कैंसर से जूझ रहा हो तो उसका ईलाज़ सिर्फ सिगरेट की डब्बी तोड़ देने भर से नहीं हो सकता । अगर सिगरेट ही उसकी बीमारी की वजह रही हो फिर भी नहीं बल्कि ईलाज़ का सही तरीक़ा ज़रूरी होता है । 

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Gender Sensitization vicharbindu

महिलाओं को सबसे अधिक शोषित महिला ही करती है । खेत बेच के बेटा को IIT की तैयारी के लिए भेज दो ! और बेटी “बी.ए.ड” कर ले तो बहुत है । एक बहु के लिए उसका ससुर सबसे अच्छा इंसान होता है लेकिन सास दुनियाँ की सबसे बेकार औरत आखिर क्यों ? ये हजारों …

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stress-in-students exams acam

मैं अभी कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल टायर- टू की परीक्षा से निकला ही था कि देखा कुछ परीक्षार्थी ग्रुप बनाकर मोबाइल में व्यग्रता से झांकते उसमें घुसे जा रहे थे। उनके चेहरे पर निराशाजनित आक्रमकता थी जो शनैः शनैः उनके क्रियाकलापों पर हावी होता जा रहा था।

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LNMU

इस आलेख में, हिंदी मैथिली के प्रखर युवा कवि विकास वत्सनाभ छात्र आन्दोलन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान और भविष्य के सामंजस्य का साधारण बोध करवाते हुए प्रतीत होते हैं । पढिये एक स्पष्ट चिंतन पर आधारित यह आलेख “एक नहीं अनेक लड़ाइयाँ समाहित हैं”

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avinash bharadwaj

दिल्ली एक प्यारा सा छत था, तो पटना में बालकनी । बस यही अंतर आया है मेरे जीवन में 1000 किलोमीटर की दूरियाँ बढने के बाबजूद । 

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ashutosh jha

कई सदियां बीत गई शताब्दियां बीत गई सहस्त्राब्दियाँ बीत गई पर एक त्याग अथवा बलिदान जो मुख्य रूप से देखा गया और जिस की अवहेलना भी की गई वह है

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