जीवन का सदुपयोग ; महर्षि  रमण


aashram vicharbindu

प्रिय पाठकों हमारे ज़िन्दगी  में कभी – कभी ऐसा वक्त आता है, जब हम अपने ही घर की समस्या से तंग आ कर अपने ही जीवन को व्यर्थ समझने लगते है । मित्रों प्रस्तुत है एक लघु कथा – महर्षि  रमण के आश्रम के समीप ही एक शिक्षक का आवास था । उनके घर लड़ाई-झगड़े होते रहते थे । एक दिन रोज-रोज के लड़ाई-झगड़े से तंग आकर शिक्षक ने आत्महत्या कर लेने का निश्चय कर लिया,……….

लेकिन इससे से पहले घर में लड़ाई-झगड़े जिससे वो तंग आ गए थे इस समस्या पर महर्षी से सलाह लेंने की सोची । अतः महर्षि से सलाह लेने के लिए उनके आश्रम जा पहुंचे । महर्षि उस समय आश्रमवासियो के भोजन के लिए पत्तले तैयार कर रहे थे ।

शिक्षक उन्हें प्रणाम कर बोले, ‘महात्मन! आप इन पत्तलों को कितने परिश्रम से तैयार कर रहे हैं, लकिन आश्रमवासी इन पर भोजन कर इन्हें फ़ेक देंगे ।’

महर्षि मुस्कुराते हुए बोले, ‘आपका कथन एकदम सत्य है, परन्तु किसी वस्तु का सदुपुयोग कर फेंक देने में कोई बुराई नहीं हैं ।

 बुराई तो तब कही जाती जब वस्तु का सदुपोग किये बिना फेंक दिया जाता । शिक्षक को महर्षि की बाते समझ में आ गई और उन्होनें उसी पल अपने मन से आत्महत्या का विचार त्याग दिया.

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