प्यार-व्यार ; अविनाश कुमार


pyar-wyar

“अदना सा तो सपना है आ ऊहो पर हंगामा है । बोलता है संतुष्ट रहो; ईहो कोई बात है, काहे रहें ? है ही का हमरे पास, एगो छोटका गो कमरा, एगो अखड़ा खाट आ एगो पड़ोसी का जंगला. गाम में एगो कठही गाड़ी था ऊहो.

बाबूजी बेच दिए ।” मैं चौधरी जी के दुकान पर प्याज चुनते हुए बड़बड़ाये जा रहा था, ध्यान ही नहीं दिया की पीछे जंगला वाली भी तेल लेने आयी है । वो सब सुन ली थी । नाक-भौंह सिकोड़े हुए चेहरे की भंगिमा बनाकर विष्मय प्रकट की । मैं अपने ही सर पर पीछे से एक हाथ लगाया…’साला ई नौकरी के फ्रस्ट्रेशन में कहीं भी कुछो बक देता हूँ ।’

पाटलिपुत्रा में उसका घर मेरे घर के ठीक सामने था, जंगले के पास उसका स्टडी-टेबल था । मेरा कमरा भी यही था, इसी कमरे में पढ़कर मैंने मैट्रिक से लेकर बीए तक कि परीक्षा एक ही बार में पास की थी, बस ये यूपीएससी का इम्तहान है जो पास नहीं कर पा रहा था | बाबूजी के गुजरने के बाद घर कि जिम्मेदारी आ गयी थी, मुनियाँ को भी पढाना था, माँ गाँव में किसी तरह अकेले घर संभाले हुई थी | बाबूजी के ईलाज में पहले ही सारा खेत बनकी पड़ा हुआ था | जिम्मेदारी कंधे पड़ी तो कमरे के किराये का अहसास हुआ | बड़ी मुश्किल से एक वकील साहब के यहाँ कंप्यूटर ऑपरेटर का नौकरी मिला | आजकल साधारण गरीब ग्रेजुएट को कौन पूछता है | वकील साहब बड़े सनकी थे, मोवक्किलों का गुस्सा मेरे उपर उतारते रहते थे | वो तो भला हो मेरे प्यारे दोस्तों का जो कुछ-कुछ खिला-पिला भी देता था और फिर मेरा दुखड़ा बर्दाश्त भी कर लेता था |

उसके 11 वीं के दिनों से उसके बीबीए के आख़िरी सेमेस्टर तक मैं उसे देखता रहा । कभी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई । समझती तो सब वो भी थी पर कभी ज्यादा भाव नहीं दिया । कभी-कभी मैं उसके पीछे पीछे भी जाया करता था ।

उसको दिखाने के लिए सब दिन भोरे उठकर छत पर सेंडो गंजी और नाड़ा वाला कच्छ पहनकर 100 बार उठक बैठक करता था, पर वो कसरती बदन को भाव ही नहीं देती थी ।

एकदिन दोस्तों के साथ वकीलबा का फ्रस्ट्रेशन उताड़ने के चक्कर में ‘दस्तखत’ सर चढ़ गया और सब बक दिया, जंगला वाला प्यार का किस्सा भी…। दोस्त तो दोस्त ही होते हैं, ‘दस्तखत’ की टंकी मेरे मुँह में लगा दी और सब कमीने भड़काकर उसके घर भेज दिया ।

होश तो था ही नहीं, पता नही ऐसा क्या बक दिया । पुरे मोहल्ले के लोग जमा हो गए, और मैं बेहोश । साले कमीने दोस्त सटक निकले ।

अब बखेड़ा तो होना ही था | अंजलि कि मम्मी पर उसके पापा चिल्ला रहे थे कि देखो बेटी आवारा हो गयी है, लड़के अब घर आकर तमाशा करते हैं | अंजली रोये जा रही थी | वो सचमुच बेगुनाह थी | अंजलि के पापा वकील साहब को जानते थे, कभी-कभी वकील साहब के यहाँ आते भी थे | उन्होंने उस रात पहचान लिया मुझे, फिर क्या था अगले दिन मेरे ऑफिस पहुँचकर वकीलबा से शिकायत करके उसे ऐसा भड़का दिया कि शाम में वकीलबा ने टर्मिनेशन-लेटर पकड़ाकर विदाई कर दिया । रास्ते भर टेम्पो में रोता रहा । भगवान आसानी से मिल जाते हैं पर नौकरी नहीं मिलती है साहब । अब तो मुझे बाट नहीं सूझ रहा था । मोहल्ले में मुँह लटकाये जा रहा था, अंजलि चौधरी जी के यहां से कुछ राशन लेकर जा रही थी ।

“आई एम् सॉरी अंजलि, मैं नशे में था, माफ़ कर दो, आई लव यू रियली यार, मेरी नौकरी क्यों छीन ली…अब कैसे गाम में बनकी खेत छुड़ाऊँगा, कैसे मुनियाँ को पढ़ाऊंगा, माँ को क्या भेजूंगा…” आँख छलक गये थे ।

अंजलि बिना बोले चली गयी । उस दिन के बाद मैंने अपना जंगला कभी नहीं खोला, पुरे सात दिन तक घर में बंद रहा, खाना मेशवाला उधारी पहुँचा जाता था ।

नौकरी जाने से उतनी तकलीफ़ नहीं होती है, जितना दिल टूटने से होती है ।

वैसे हाल उधर भी कुछ अच्छा नहीं था । लड़कियों के दिल में मोहब्बत का असली एहसास तब होता है जब उसे उसका चाहने वाला इग्नोर करता है । सात दिन से हम दोनों ने एक दूसरे को देखा नहीं था, 8 वें दिन सुबह नहा-धोकर अंजलि की यादों को आखिरी बार बाथरूम में फ्लश करके नौकरी ढूंढ़ने चल दिया ।

किस्मत अच्छी थी, ठीक-ठाक एक नौकरी मिल गयी । कल से ज्वाइन करना था । दोपहर में घर आते हुए अंजलि देख ली थी । उसे जितना अफ़सोस मेरे उस तमाशे से था उससे कहीं ज्यादा अनकही मोहब्बत से बिछुड़ने का था । अक्सर ऐसा होता है कि जब आप किसी को अचानक से तरजीह देना बंद कर देते हैं तो उसे आपकी कमी खलने लगती है | अंजली पिछले 7 दिन में मुझे एक बार भी नहीं देखी थी, और आज मैंने उसे पूरा इगनोर कर दिया था |

“तुम ??”

“आई एम् सॉरी….बस तुमसे सुलह करने आई हूँ, इसका मतलब बिल्कुल भी ये नहीं है कि तुम्हारे लिए मेरे दिल में कुछ भी है ।”

अचानक अपने दरवाजे पर उसको देखकर मैं थोड़ा घबड़ा गया था ।

“हूँ…” मैं सर हिला रहा था ।

“पहली बार तेरे घर आयी हूँ, बैठने भी नहीं बोलोगे?”

“हाँ हाँ आओ…”

घर में सिर्फ एक खाट था, जिसपर सूजनी बिछा हुआ था ।

पुराने भुलाये अरमान हिलोरें लेने लगी थी । लड़ाई-झगड़ा तो कब का भूल गया था । 5 मिनट तक वो खामोश रही फिर उठकर खड़ी हो गयी ।

“ठीक है मैं चलती हूँ, अपना नाम तो बता दो…”

“प्रभु”

अभी दो कदम दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा ही था कि पीछे पलटी और बड़े जोर से गले लगायी, उसकी आँखों में आंसू था ।

“आई लव यू प्रभु”

हम फिर से बिस्तर पर थे, जंगला बंद था, किवाड़ कब बंद हो गया पता नहीं चला ।

मेरे जिस्म की सरहदों पर उसकी उंगलियां कत्थक कर रही थी, टेप रिकार्डर में बज रहे  राग मल्हार के सिवाय कहीं कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, अमन कायम करने आयी थी और यहां मेरा सर्जिकल स्ट्राइक कर रही थी ।

मेरे सीने पर उसके नग्न उरुजों का दस्तक और चेहरे पर उसके उनमुक्त और उदंड जुल्फों का रंगीन चादर/पर्दा मदहोश किये जा रहा था, उसकी तपन बर्दाश्त नहीं था । मैं पसीने से तर-बतर था । शिराओं में भारी अकड़न था…साँसे भी फूल रही थी..।

मेरे गर्दन पर उसके लंबे नखों का हस्ताक्षर था और उसके सभी होठों पर मेरे दाँतों का…।

इश्क का चरमोत्कर्ष था आज ।

“तेरे उत्पात से जो रक्तपात हुआ है, खाओ इस रक्त की कसम और भर दो मेरी मांग मेरी इसी लहू से और बना लो हमेशा के लिए अपना ”

सहसा अंजलि मेरे आँखों में आँखें डालकर बोली । इश्क़ बेपरवाह होता है, उस वक़्त हम भी सभी नियम-कानून, घर-परिवार और सामजिक बंधनों से मुक्त बेपरवाह होकर एक काल्पनिक दुनियां में घर बसा रहे थे ।

बीबीए के बाद अंजलि एमबीए करने नोएडा चली गयी, मैंने भी अपना ट्रांसफर नोएडा ले लिया । हमलोग एक फ्लैट लेकर लिव-इन में रहने लगे । ईश्क में जिंदगी इतनी रंगीन हो जाती है कि गुजरते वक़्त का एहसास ही नहीं होता है ।

मेरी भी प्रोन्नति हो गयी थी, आमदनी बढ़ गयी थी, एक बुलेट दरवाजे पर खड़ा रहने लगा था

हम हर संडे सुबह-सुबह बुलेट से नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस हाईवे पर मॉर्निंग वॉक करने निकलते थे । सुबह को अंजलि कुछ ज्यादा ही रोमांटिक रहती थी, जैसे मैं गोधूलि में होता था । उसका कहना था परिदे को भोर पसंद होता है । पर मुझे शाम को हलके अँधेरे में कहीं उसे पीछे से पकड़कर किसी कोने में ले जाना, उसके गर्दनों से उसके होठों तक अपना नाम लिखना पसंद था ।

“परभुआ तेरे बुलेट की आवाज मुझे बहुत पसंद है….तुमने कभी गौर किया है जब तेरे-मेरे बीच कुछ नहीं होता है तो ऐसा ही एक आवाज कमरे में गूँजता है…”

अंजलि को जब मुझपर बहुत प्यार आता था तो वो मुझे प्रभु से परभुआ बना देती थी ।

“वैसे ये तेरा भारी-भरकम बुलेट और मैं 41 किलो की छरहरी छोड़ी… सब देख कर हँसते होंगे”

“41 किलो 600 ग्राम…”

“अपने मेहनत के वजन का देखकर ही हिसाब लगा लेते हो..वैसे सही ही बोले हो…6 महीने में ही 4 नंबर बढ़ गया है ।”

“ये मामूली हाथ नहीं जानेमन, एक पंडित का चाक है, सुराही गढ़ना आता है…”

“या कहीं शर्तिया ईलाज क्लिनिक में कम्पाउंडरी किये हो?”

“बड़ी आवारा लड़की है तू”

“सब प्रभु के सत्संग से कृपा आयी है ”

वक़्त के साथ प्रेम भी जवान होता है और फिर जब 4 घंटे की गुटरगूँ से 24 घंटे का साथ शुरू होता है तो प्रेम थोड़ा-थोड़ा नमकीन होने लगता है । और फिर ये आज का मॉडर्न जमाना जहाँ हर चीज में हिस्सेदारी बराबर की तय होती है, चाहे बर्तन धोने का हो या खाना बनाने का ।

और आज़ादी तो चाहिए ही । वक़्त के साथ हम भी इश्क़ में पुराने हो रहे थे । और फिर 24 घंटे का साथ इश्क को परवान चढ़ा चूका था ।

अंजलि के एमबीए होने के साथ ही हम घरवालों को रुलाकर शादी कर लिए थे । हमारी शादी सुबह के 11 बजे काले कोट वाले पंडित जी करवाये थे । दोपहर 2 बजे हमनें सुहागरात का वक़्त रखा था ।

हम थक गये थे, एहसास एवरेस्ट फतह करने से कुछ कम नहीं था…वो नहाने गयी थी और मैं लूंगी पहने सोफे पर निढाल था…कॉल बेल से मेरे बेसुध बदन में हरकत हुई ।

दरवाजे पर बेवक़्त के मेहमान कन्हैया जी तशरीफ़ लाये थे । इधर अंजलि भी नहाकर रेशमी गाउन में लिपटी बाथरूम से बाहर निकली थी ।

“नमस्ते भाभी….क्या हाल-चाल है?”

“सब बढियाँ छोटका बाबु….आज छुट्टी था तो थोड़ा घर संवार रही थी”

“सच में क्या? ”

“हाँ । तो?”

“नहीं….खंडहर बता रही है ईमारत कुछ देर पहले बुलंद थी…”

“धत्त”

अंजलि लजाकर भन्साघर चाह बनाने चली गयी । कन्हैया पलंग की हालत और घर में बिखड़े वस्त्रों से समय की गाथा का अनुमान कर लिया था ।

आज पूरे 6 साल हो गया है हमारी शादी का । हमनें एक दूसरे को जिंदगी जीने की आजादी दे रखी है । जिंदगी की भागदौड़ और भौतिकता को पाने की आंधी में प्यार अब प्यार-व्यार हो गया है । नमकीन हो रहे इश्क़ को शरबत की तरह रखने को हमने संविधान बना लिया । प्यार करने को नैतिक जिम्मेदारी बना दी और प्यार करने को भी एक रूटीन और नियम में ढाल दिया ।

प्यार तो आज भी वैसा ही दीखता है बस इतना सा बदला है कि आधुनिकता ने मौलिकता को नैतिकता में बदल दिया है ।

लेखक :  अविनाश कुमार

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