काशी – यात्रावृतांत


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अभी काशी से विदा भी नहीं हुआ था कि कूची मष्तिष्क के अंतरपटल पर हर्ष की स्याही से क्षणों को दकीचे जा रहा था । पेट से माथे तक बबंडर उठा हुआ था । लेखक मन व्याकुल था, बार-बार कोशिस करता था और शब्द अव्यवस्थित हो रहे थे । मैं हर क्षण को शब्दों की चादर में छुपाकर आप तक सहेजकर लाना चाहता था ।

हम रात के आखिरी पहर में काशी पहुंचे थे । मुगलसराय से जो ऑटो (टेम्पो) रिजर्व था, हरिश्चन्द्र घाट पर पहुंचा । चिताएं भभक रही थी, जिस जिस्म को जिंदगी भर सवांरा था, आज राख हो रहा था, चाण्डाल बाँस के बल्ले से उसे राख करने को आतुर थे, हरिश्चन्द्रों की भीड़ लगी थी । एक कोई बेटा था, जिसकी आँखों में भावनाओं की समंदर उतर आया था, जो ज्वार बनकर आग बुझाने को व्याकुल था ।

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हम नीचें गंगा के तीर पहुँचकर अंजलि में चुरुक भर गंगाजल उठाकर खुद को सिक्त किया । अभी सूरज के मुँह से रात की चादर सरकी नहीं थी, कुछ देर वहीं बैठा फिर सभी मित्रों से विमर्श के बाद नौका विहार का आनंद उठाने का विचार किया गया । हज़ारों की संख्या में विदेशी सैलानी कुछ सैकड़ों की संख्या में नावों पर सवार थे, बड़े बड़े कैमरे ज्यामिति के सभी प्रमेयों को सिद्ध कर रहे थे । कभी सीधी रेखा पर, कभी तिरछी, कभी कोण बनाकर कैमरे में वक़्त के संग दृश्य को संजोया जा रहा था ।

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और देखने को मिल रही थी हमारे हिंदुस्तान के युवाओं के हाथों घटिया मेहमानवाजी । खैर अजनबियों को हमारे संस्कार में अभिनंदन नहीं करते पर हम एक-आध ऐसे भी थे जिनपर पाश्चात्य संस्कृत का कुछ असर था, हमारी नाव के बगल से उनकी नाव गुजरी, हमने मुस्कुरा कर हाथ हिलाकर एक दूसरे का अभिनन्दन किया । आज काफ़ी दिनों बाद उगते सूरज को देख रहा था, सूरज गंगा के दूसरे छोड़ पर गंगा स्नान करके धीरे धीरे पानी की सतह से ऊपर उठ रहा था ।

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दरभंगा घाट से गुजरते हुए गंगा से बड़ा अपनापन लग रहा था । इतिहास की अधिक जानकारी नहीं है, पर यहाँ लगा की महाराज दरभंगा ने भी बड़े-बड़े काम किये थे । नाव सभी छोटी-बड़ी घाटों से गुजरती हुई दश्वमेघ घाट पर हमें छोड़ किसी और को गंगा की सैर कराने निकल पड़ी ।
माननीय गार्जियन भाई नवल श्री पंकज बिना सोचविचार के स्नान को गंगा में उतर गए । बाकि हमलोग कुछ देर ठंढ और गंगाजल की स्वच्छता पर चिंतन-मनन करते रहे और फिर 28 वर्षों का पाप पखाड़ने उतर गये । जैसे ही पाप उतरा, शरीर का तापमान बढ़ गया । दो मित्र तो अभी तक पारासीटामोल की शरण में हैं । भाई की ईच्छा काशी विश्वनाथ की पूजा की भी थी परंतु हमें देव दीपावली के कारण भीड़ की उपस्थिति का अंदाज़ा था । देव को बाहर से ही नमस्कार किया । भाई लोग कुछ देर पंक्तिबद्ध रहे और फिर बीएचयू कैंपस के विश्वनाथ पर अछिन्जल समर्पण के प्रस्ताव के साथ लौट आये ।

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हमारे मित्र पंकज भाई बीएचयू से आये थे, हम उनके साथ ई-रिक्सा पर काशी की गलियों से गुजरते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में उपस्थित हुए । यहाँ विश्वनाथ जी का संपूर्ण दर्शन हुआ । मंदिर का आलय भव्य है । पता चला मालवीय जी के सपने को साकार करने में दरभंगा महाराज का भी बड़ा योगदान था ।

अब तक जठराग्नि ज्वालामुखी बन चुकी थी, पहला निर्विरोध लोकतान्त्रिक निर्णय छोले-भटूरे जलपान के निश्चय से हुआ तत्पश्चात ऊर्जा का संचार सभी पुण्यात्माओं में दिखने लगा था । दोपहर पंकज भाई के निवास में आराम किया गया ।

2 बजे हम अपने मुख्य उद्देश्य मैथिलि साहित्य और भासा के विकास को समर्पित साहित्यिक चौपाड़ि के मासिक बैसार को काशी यात्रा के आखिरी पड़ाव अस्सी घाट की तरफ़ चल पड़े । यहाँ का दृश्य बड़ा मनोरम था । घाट की सीढ़ियों पर कई सैलानी चीलम की कश ले रहे थे । काले और लाल दो तरह के वस्त्रों में जटाधारी बाबाओं का दर्शन हुआ । काले वाले शायद शाक्त थे । पूरे घाट के निरीक्षणोंपरांत हम यज्ञशाला के फर्श पर अपना कार्यक्रम शुरू किये । कार्यक्रम अद्भुत रहा । कुल 5 नये लेखकों ने अपनी रचना को पहली बार प्रस्तुति देकर मैथिलि भासा एवं साहित्य के संवर्धन की ओर अग्रसर हुए ।

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कार्यक्रम के उपरांत हम उपस्थित भीड़ का आनंद लेने लगे । जितना सुना था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत है काशी । बालाएँ सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी, एक क्षण में किसी शायर की ग़ज़ल यहाँ मुक्कमल हो सकती है, कोई सिरफिरा लेखक एक रात में उपन्यास लिख सकता है । कुछ चित्रकला संकाय के बच्चे दृश्यों को चित्रों में उकेर रहे थे ।

आया तो पहले भी था एकबार पर उस वक़्त इतनी दिलचस्प नहीं लगी थी पर अबकी हम ईश्क़ में नहीं थे, इस्तीफ़ा देकर स्वच्छंद ईश्क़कार के रूप में विचरण कर रहे थे । काशी के हर मोड़ पर हम बहक से रहे थे, रूककर इश्क़ में फ़ना होने को दृढसंकल्पित थे । धरती पर कहीं कहीं स्वर्ग है तो काशी में भी है । फिजाओं में ही नशा है, चीलम की मादकता है । धमनियों में रक्त भांग हो गया था, शनैः शनैः प्रवाह में था । हम रम से गये थे ।

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हज़ारों लोगों के साथ हम भी शाम को गंगा आरती के गवाह बने ।असंख्य दीप गंगा में तैर रहे थे । सबसे खास आकर्षण था अखंड दीप । एक टोकरी में दीये जलाकर उसे बाँस के एक डंडे में लटकाकर रख दिया जाता है जो पूरी रात जलता रहता है । ऐसे सैकड़ों अखंड दीप यहाँ जल रहे थे । लोगों ने बताया कि ये भारत माता के वीर सपूतों की याद में नित्य रूप से जलाया जाता है । एक बूढ़ी माँ अपने शहीद बेटे की याद में अखंड दीप जला रही थी । हमारी आँखें नम हो गयी थी ।

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समय कब गुज़र गया, पता ही नहीं चला । अब हमारे वापस लौटने का वक़्त हो गया था । काशी से मुगलसराय तक सब गुमशुम से ऑटो में बैठे थे, मन-मस्तिष्क पर काशी की अमिट छाप पड़ गयी थी ।

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ट्रेन का ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा । हम पटना के लिए प्रस्थान कर रहे थे, इस उम्मीद के साथ की अब हर साल एक बार तो जरूर काशी आएंगे ।

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