छोटकी भौजी


chotki bhouji vicharbindu

आमतौर पर मेरा दिल्ली से प्रेम का एक वजह आप मेट्रो का होना कह लिजिये । इसने इस घुम्मकर किस्म के इन्सान को एक ठौर दिया । और समझ लीजिये उसे और घुमने के लिए उकसाने का भी काम किया । कोई 10 बजे सुबह का समय रहा होगा ।

मेट्रो में भीड़ अपने चरम सीमा पर था और किसी तरह धक्के खाते हुए मैं भी मेट्रो में सवार हो लिया । अभी मेट्रो चली भी नहीं थी कि नजरे सामने जा कर ठहर गयी !!!!

“ एक साडी पहने लड़की का जब फोटो लाया जाता है – कुमार विस्वास साहब याद आ गए “

तो एक साडी पहने लड़की पर नजर जा कर ठहर गयी । कुछ जाना पहचाना सा लगा और कुछ अपनापन का भी ऐहसास हुआ । ज्यों ज्यों मेट्रो में भीर बढती जा रही थी वो अपने पिया के नजदीक सिमटती जाती । ओठों में लगा लिपिस्टिक शर्ट के कालर से रगड़ खा बदरंग होता जा रहा था । फिर भी आखों में एक उल्लास सा नजर आ रहा था और अगल बगल वाले को कनखियों से देख शरमा भी रही थी ।
अब मेरा उसके प्रति आकर्षित होने का कारन ही उसके सर को साडी के पल्लू से ढकने का तरीका था । लाल साडी में क्या बला की खुबसूरत लग रही थी । हाथो में लगा मेहँदी, पुरे कलाई में लाह की चमकीली चुरीयां, और ओठों की लाल लिपिस्टिक ऊपर से आधे सर को ढके हुए साडी के पल्लू से झाँकती बालो में सलीके से लगी हुई लाल सिंदूर ।

chotki bhouji vicharbindu

सच बताऊ मैंने कई बार उड़ती नजरो से देखा उसे, और देखूं भी क्यों न अपने मिथिला की ही तो थी । पूरे मिथिलांचल के संस्कृती को ले वो अपने साथ चल रही थी उस अनजाने शहर में । बरबस याद आ गयी अपनी छोटकी भौजी । उसे देख कर यूँ लगा थोरी देर के लिए की हमरी छोटकी भौजी यहाँ कहाँ से आ गयी । वही आखों का पैनापन, वही नाक-नक्श , वही गोरापन और सामान्य सा कद काठी । और हाँ सर पर पल्लू रखने का तरीका भी वही था और यहाँ तक की लिपिस्टिक का रंग भी । वो बचपन का दिन भी दिमाग में कौंध गया । वो अल्हर मजाकिया अंदाज भी याद आ गया और छोटी भौजी भी के हँसी ठिठोले भी ।


लेखक : अविनाश भारतद्वाज

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