बदरंग होता बसंत


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बसंत के आगमन की पदचाप खोजते जब मैं प्रकृति की ओर उन्मुख हुआ तो कुछेक सरसों के फूल और गेंदें में मुझे बसंत सकुचाया सा मिला । फैलते कंक्रीट के जंगलों में कायदे से रखे गमलों तक पहुँचने में बसंत सहमा-सहमा ,घबराया सा लगा।

महुआ स्वयं अपने अस्तित्व की जंग में कराहता दिखा फिर मादक सुगंध कौन फैलाये । आम्रमंजरी पर रसायन के छिड़काव से थूथने फड़कने लगे और बिजली सी कौंधी “यह नहीं आम्रवन मधुशाला “। “कोयल की कूक” की कौन कहे “कौवे की काँव-काँव ” भी बामुश्किल सुनाई पड़ती हैं । ठंड से निज़ात मिली नहीं कि बढ़ते ताप में बसंत वाष्पीकृत हो गया है । तन की जलन ने मन को दग्ध कर डाला है । न आधार है न सहज अधर फिर केवल अतिरंजनाओं पर बसंत टिके कैसे ?

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बसंत तलाशते मैं साहित्य के वातायन में भी झांका । सपाटबयानी वाली कविताओं से बसंत उसी तरह ग़ायब मिले जैसे छंद । साहित्य में किसानों की भांति प्रकृति से उपेक्षित बसंत भी आउट डेटेड हो चले हैं । बसंत के साथ ही कवियों की दुनियाँ में होने वाले हंगामें का शोर कब का थम चुका है और मैं बसंत ढूढ़ता फिर रहा हूँ ।

मैं अपने घर का बादशाह हूँ

बदलती जीवन शैली, काम के अधिक घंटे का दबाव, अवकाश के क्षणों में बड़े-बड़े माॅल में अनावश्यक खरीददारी में खुशी खोजती भीड़, तहरीफ के लिए नेट सर्फिंग के बढ़ते चलन से कद्र विहीन बसंत मुंह छिपाने को विवश है । बसंत,यौवन और प्रेम की त्रयी को कैरियर संवारने के बोझ ने होश उड़ा रखें हैं । सौन्दर्यबोध को अर्थबोध के पैनेपन नें बिंध दिया है ।

न जानें कब बसंत फिसलता सा प्रतिवर्ष आता है और नि:शब्द लौट जाता हैं । कोई नोटिस भी नहीं करता, चर्चा भी नहीं होती, आता भी है या नहीं कहा नहीं जा सकता । एहसास के तल पर सरसता का सूखापन फैलता जा रहा है……….।

काबर झील पक्षी अभयारण्य

कहीं मैं सिरे से ही तो गलत नहीं हूँ । विभिन्न भारी-भरकम समस्याएं सुरसा की तरह मुँह फैलाए खड़ी है और मैं बसंत ढूढने के बहाने जबरन अनदेखी का प्रयास तो नहीं कर रहा । अगर ऐसा हैं तो पलायनवादी प्रवृत्ति के प्रतिफल काफी गहरे होंगे ।


लेखक : निशिकांत ठाकुर 

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